फिल्म 'तीसरी कसम' के सदाबहार गीत 'चलत मुसाफिर' का गहरा दर्शन, मौज-मस्ती के पीछे छिपी है एक कलावंती की बेबसी
नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गीतों को उनके मूल संदर्भ से अलग केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा जाता रहा है, जबकि उनके पीछे गहरे सामाजिक सरोकार छिपे होते हैं। ऐसा ही एक कालजयी उदाहरण वर्ष 1966 में प्रदर्शित निर्देशक बासु भट्टाचार्य की फिल्म ‘तीसरी कसम’ का लोकगीत ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे’ है। रेडियो के जमाने से लेकर आधुनिक रीमिक्स और रील्स के दौर तक इस गीत की धुन पर लोग झूमते आ रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस हंसते-गाते ट्रैक के पीछे एक स्त्री की बेबसी और सामाजिक विडंबना का मर्मस्पर्शी ताना-बाना बुना गया है।
प्रसिद्ध गीतकार और इस फिल्म के निर्माता शैलेंद्र द्वारा रचित यह गीत फणीश्वरनाथ रेणु की कालजयी कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। बॉक्स ऑफिस पर असफल रहने के बावजूद इस फिल्म के गानों को आज भी संगीत की धरोहर माना जाता है। इस विशेष गीत में प्रयुक्त ‘पिंजड़े वाली मुनिया’ का सीधा संबंध फिल्म की मुख्य नायिका हीराबाई के जीवन से है, जिसका किरदार अभिनेत्री वहीदा रहमान ने निभाया था। हीराबाई एक नौटंकी कलाकार है, जिसकी कला पर पूरा समाज फिदा है, लेकिन जब उसे अपनाने की बात आती है, तो वही समाज पीछे हट जाता है।
फिल्म की कहानी के अनुसार, राज कपूर द्वारा अभिनीत हीरामन नाम का एक सीधा-सादा बैलगाड़ी चालक अनजाने में एक नौटंकी डांसर को अपनी गाड़ी में बिठा लेता है। यात्रा के दौरान दोनों के बीच एक गहरा आत्मीय रिश्ता पनपने लगता है, लेकिन मेले में पहुंचने पर जब हीरामन को हीराबाई के पेशे की असलियत और समाज द्वारा उसे वेश्या जैसी नजरों से देखने का पता चलता है, तो वह टूट जाता है। वह हीराबाई को यह काम छोड़ने की सलाह देता है, परंतु अपनी मजबूरियों के चलते वह ऐसा नहीं कर पाती, जिसके बाद हीरामन जीवन की ‘तीसरी कसम’ खाता है कि वह कभी किसी नौटंकी वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा।
इसी पृष्ठभूमि में ‘पिंजड़े वाली मुनिया’ शब्द उस नाचने वाली महिला का प्रतीक बनकर उभरता है, जो अपनी कला से हर राहगीर और मुसाफिर का मन तो मोह लेती है, लेकिन खुद एक अदृश्य पिंजरे में कैद रहने को अभिशप्त है। गीत के अंतर्निहित अर्थ में समाज के दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार किया गया है। गीत के बोलों में बताया गया है कि वह मुनिया जब हलवाई की दुकान पर जाती है या पनवाड़ी के पास जाती है, तो हर कोई उसके रस और आकर्षण में डूब जाना चाहता है। हर वर्ग का पुरुष उसके मोहपाश में बंधने को तैयार है, लेकिन उसे अपनी गृहस्थी या सम्मानजनक जीवन का हिस्सा बनाने का साहस किसी में नहीं होता।
शैलेंद्र ने बेहद चतुराई से एक बेहद चुलबुली लोकधुन का सहारा लेकर उस दौर की कलावंती और नौटंकी महिलाओं की उस नियति को उजागर किया था, जो जिंदगी भर दर्शकों की तालियों के पिंजरे में घुटती रहती थीं। आज के दौर में जब इस गाने की तर्ज पर नए रीमिक्स बनाए जा रहे हैं, तब इस गाने के वास्तविक साहित्यिक और सामाजिक अर्थ को समझना सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों को देखने का एक नया नजरिया प्रदान करता है। यह गीत केवल नाचने-गाने का जरिया नहीं, बल्कि एक मूक विलाप है जिसे उत्सव की तरह गाया जाता रहा है।
