महिला समानता दिवस पर सोमी अली ने कहा, सिर्फ चर्चा से नहीं सिस्टम और सोच बदलने से महिलाओं को वास्तविक बराबरी मिलेगी
सोमी अली के अनुसार महिलाओं के मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक बातचीत हो रही है और यह सकारात्मक बदलाव है। लंबे समय तक महिलाओं का चुप रहना सामान्य माना जाता था, जबकि कई मामलों में यही चुप्पी अत्याचार करने वालों को बचाती रही। हालांकि, उनका मानना है कि आवाज उठाने के बाद वास्तविक बदलाव तभी माना जाएगा जब अदालतों, पुलिस, परिवारों और सामाजिक व्यवस्था की प्रतिक्रिया भी बदले।
उन्होंने विशेष रूप से उन महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई जो तत्काल खतरे में होती हैं। उनके मुताबिक ऐसी महिलाओं को सहायता मिलने में अक्सर समय लग जाता है। सुरक्षा आदेश, आश्रय और कानूनी प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाओं के बीच महिला को कई बार उसी परिस्थिति में रहना पड़ता है जहां उसकी सुरक्षा को खतरा बना रहता है। सोमी अली का कहना है कि सबसे जरूरी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे गंभीर खतरे में मौजूद महिला को जल्द सुरक्षित स्थान मिल सके।
महिला सशक्तीकरण के लिए आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और कानूनी सहायता को भी उन्होंने महत्वपूर्ण माना। लेकिन उनके मुताबिक इन सुविधाओं के साथ आत्मविश्वास भी जरूरी है। कई महिलाएं संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद डर, सामाजिक दबाव या दूसरों की स्वीकृति की आवश्यकता के कारण अपने फैसले लेने में कठिनाई महसूस करती हैं। इसके विपरीत कुछ महिलाओं ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने लिए सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन का रास्ता चुना है।
सोमी अली ने समानता की बहस में संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि महिला समानता का अर्थ हर परिस्थिति में महिला को सही और पुरुष को गलत मान लेना नहीं है। उनके अनुभव में महिलाओं के साथ गंभीर अत्याचार के मामले वास्तविक हैं, लेकिन किसी भी पक्ष को बिना तथ्य के हमेशा सही मान लेना न्याय की भावना के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि समाज में महिलाओं और पुरुषों दोनों को इंसान के रूप में देखा जाना चाहिए, जिनके व्यवहार और परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं। उनके अनुसार वास्तविक समानता का आधार किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि तथ्य और सच के आधार पर न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।
सोमी अली ने यह भी कहा कि झूठे आरोपों की स्थिति उन महिलाओं के लिए भी नुकसानदेह हो सकती है जो वास्तव में हिंसा का सामना कर रही हैं। इससे वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों पर संदेह बढ़ सकता है और न्याय पाने की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। इसलिए उनका जोर इस बात पर है कि कमजोर और जरूरतमंद व्यक्ति की सुरक्षा हो, लेकिन गलत को केवल किसी पक्ष के आधार पर सही न ठहराया जाए।
महिला समानता दिवस पर उनका संदेश महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी तथा निष्पक्षता को जोड़ता है। उनके मुताबिक बदलाव तभी सार्थक होगा जब महिलाओं को अपनी बात कहने का भरोसा मिले, खतरे के समय व्यवस्था तेजी से काम करे और समाज समानता को केवल चर्चा का विषय न रखकर व्यवहार और संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनाए।
