October 2, 2026

मालवा में कहाँ गए पितरों के दूत? कौवों के विलुप्त होने की कहानी

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– अशोक झलोया 

मंदसौर, नीमच, रतलाम सहित मालवा क्षेत्र में पितरों के दूत कहे जाने वाले कौवे इस बार पितृपक्ष में श्राद्ध की थाली का भोग खाने के लिए भी मौजूद नहीं हैं। श्राद्ध पक्ष में यह विषय लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। कितनी भी आवाज लगाओ, कौवे नहीं आते। पहले गांव-गांव में आवाज लगाने पर घर के आंगन और छत पर श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के लिए कौवों की भरमार होती थी। परिजन बड़ी उम्मीद से कौवों को बुलाते हैं, धार्मिक मान्यता है कि कौवे के माध्यम से ही पितरों तक श्रद्धा का भोजन पहुंचता है।अब श्राद्ध में भटकते हे लोग
पितृपक्ष में पहले गाँव-गाँव में सुबह कांव-कांव से नींद खुलती थी।
इस बार मंदसौर, नीमच, रतलाम, आगर-मालवा, उज्जैन में स्थिति यह है कि श्राद्ध का भोग लगाने के लिए कौवा ही नहीं मिल रहा। लोगों को मजबूरी में गाय और कुत्ते को भोग लगाना पड़ रहा है। यह केवल धार्मिक संकट नहीं, पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है।

श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में श्राद्ध की परंपरा श्रद्धा से जोड़ी गई है। रामायण में कथा का उल्लेख मिलता है कि देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के चरणों में चोंच मार दी। इससे माता सीता के चरण लहू लहान हो गए पीड़ा हुई इससे व्यथित होकर भगवान श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र से बचने के लिए इंद्र के पुत्र जयंत को तीनों लोकों में कहीं शरण नहीं मिली, तो वह अंत में भगवान श्रीराम की शरण में आया और क्षमा मांगी। ब्रह्मास्त्र वापस नहीं लिया जा सकता था, इसलिए कौवे को अपनी एक आँख गंवानी पड़ी। उसकी क्षमा याचना पर भगवान श्रीराम ने उसे वरदान दिया कि पितृपक्ष में जो भी कौवे को भोजन देगा, वह पितरों तक पहुंचेगा।

तब से श्राद्ध पक्ष में पंचबली भोग की मान्यता है। शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण भोजन से पहले पाँच ग्रास निकालने का प्रावधान है –
1. गो बली – गाय के लिए
2. श्वान बली – कुत्ते के लिए
3. काक बली या वायस बली – कौवे के लिए
4. देवादि बली – देवताओं के लिए
5. पिपीलिकादि बली – चींटियों के लिए
इस तरह किया गया श्राद्ध ही शास्त्रोक्त विधि से पूर्ण माना जाता है।

मंदसौर-नीमच-रतलाम सहित मालवा में कौवे विलुप्त होने के 5 बड़े कारण

1. बर्ड फ्लू – सबसे बड़ा झटका (2020-21)
प्राणी शास्त्रियों के अनुसार मालवा में कौवों की संख्या में सबसे बड़ी गिरावट बर्ड फ्लू के बाद आई। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 2020 से जनवरी 2021 के बीच मध्यप्रदेश में 3,890 कौओं की मौत हुई। अकेले मंदसौर में 200, आगर-मालवा में 48, इंदौर में 155 कौओं में H5N8 वायरस की पुष्टि हुई थी। भोपाल की NIHSAD लैब ने मंदसौर, नीमच, आगर, इंदौर के कौओं में बर्ड फ्लू की पुष्टि की थी।

2. आवास का खत्म होना
पक्षी प्रेमी गणेश रावत और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला कहते हैं – “कौवा इंसान के सबसे करीबी पक्षी है, लेकिन अब उसके घोंसले के लिए नीम, पीपल, बड़ जैसे बड़े पेड़ नहीं बचे। पुराने पेड़ कटे, तो खोया कौवों का बसेरा। उनकी जगह कंक्रीट की इमारतें हैं।” घरों का डिजाइन बदल गया है, पहले खुले आंगन और पेड़ों के बीच ये आसानी से रहते थे, अब जगह नहीं बची।”

3. इंदौर मॉडल की सफाई बनी मुसीबत
इंदौर के प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ अजय गणीकर बताते हैं – मालवा के शहरों में पिछले 10 साल से चल रही क्लीन सिटी ड्राइव के कारण घरों का बचा खाना अब कचरा गाड़ी से सीधे ट्रेंचिंग ग्राउंड चला जाता है। पहले जो जूठन आंगन में फेंकी जाती थी, वही कौवों का भोजन थी। अब उन्हें शहर में भोजन ही नहीं मिलता। साथ ही कौवे मृत पक्षियों का मांस खाते हैं, इसलिए वे सबसे ज्यादा संक्रमित होते हैं और झुंड में रहने के कारण वायरस तेजी से फैलता है। कौवा का स्वभाव होता है वह कभी भी अकेले भोजन नहीं करते जहां भी उन्हें भोजन मिलता है वह आवाज लगाकर अपने सभी साथियों को बुला लेते हैं इसीलिए सामूहिक भोजन को व्यंग में लोग काग भोज भी कहते हैं

4. पॉलीथिन और रसायन
बीएचयू की प्राणी शास्त्र प्रोफेसर चंदना हल्दर के अनुसार – “लोग बचा खाना पॉलीथिन में बांध कर फेंकते हैं।

कौवा जो पर्यावरण का सफाईकर्मी है, वह पॉलीथिन में लिपटा सड़ा खाना नहीं खा पाता।” साथ ही खेतों में क्षमता से अधिक उपयोग होने वाला कीटनाशक और पशुओं में प्रतिबंधित दवा डाइक्लोफेनाक सोडियम का असर है। पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. संजीव नेहरू बताते हैं कि मरे हुए पशु में डाइक्लोफेनाक का अंश रह जाता है, जिसे खाने से कौवे और गिद्धों की किडनी फेल हो जाती है। उससे भी उनके जीवन को खतरा बन जाता है और जहां भी कौवे एकत्रित होकर सामूहिक भोजन करते हैं उनकी बड़ी संख्या में मृत्यु हो जाती है

5. मोबाइल टावर रेडिएशन और पानी की कमी
अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. ग्रीनफ के अध्ययन में कहा गया है कि मोबाइल टावरों से निकलने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन भी पक्षियों के लिए जानलेवा बनती जा रही है एक और कारण है गर्मियों में पानी के सकोरों की कमी इससे कौवों के प्रजनन पर असर डाल रही है।

प्राणी शास्त्र विशेषज्ञों की चेतावनी
इंदौर के पक्षी विशेषज्ञ अजय गणिकर – “मालवा कृषि प्रधान क्षेत्र होने से पक्षियों से समृद्ध रहा है, लेकिन लगातार घटते जंगल और शहर में पेड़ों की कमी ने घोंसला बनाने की जगह ही नहीं छोड़ी।” पहले खेतों की मेड़ पर आम और नीम एवं छायादार व फलदार वृक्ष लगाए जाते थे परंतु अधिक फसल लेने की होड़ में ऐसे पेड़ों को तेजी से काटा जा रहा है इसके कारण इनके रहने की बहुत बड़ी समस्या होती जा रही है पशुपालन विभाग, मप्र के डॉक्टर आर.के.रोकड़े के अनुसार- पिछले दिनों “लगभग 1300 कौओं की मौत की सूचना मिली है, जांच में बर्ड फ्लू ही कारण निकला। प्रवासी पक्षियों के बीट से यह वायरस आया।”
विशेषज्ञ मानते हैं कि कौवा केवल पक्षी नहीं, इकोसिस्टम का सफाईकर्मी है। यह मृत जानवरों को खाकर संक्रमण रोकता है। अगर कौवा लुप्त हुआ तो गौरैया की तरह यह भी सिर्फ तस्वीरों में रह जाएगा।

निष्कर्ष
कौवा वह पक्षी है जो कल तक हर गली-मोहल्ले में नजर आता था। सुबह से शाम तक खेतों और शहरों में उसकी कांव-कांव गूंजती थी।

आज वही पक्षी मुश्किल से नजर आता है। यह जैविक विविधता के लिए खतरे की घंटी है। कौवों की घटती संख्या केवल एक पक्षी की नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के रिश्तों की कहानी है। हमारी आधुनिकता ने इन परिंदों की जगह छीन ली है। अब वक्त है फिर से इन रिश्तों को जोड़ने का, ताकि अगली पीढ़ी कांव-कांव की आवाज सिर्फ किताबों में नहीं, अपने आसमान में भी सुन सके।

क्या करें –
1. नीम, पीपल, बड़ जैसे देशी पेड़ों को संरक्षित करें
2. गर्मियों में छत पर पानी और अनाज रखें
3. जूठन पॉलीथिन में न फेंकें
4. पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि किसी भूखे को खिलाना है, साथी प्रकृति को भी संरक्षित करने कि आज आवश्यकता है कौवों को बचाना भी सच्ची श्रद्धांजली, कौवे की घाटी संख्या एक पक्षी की विलोपित होती जनसंख्या नहीं है बल्कि प्राकृतिक और मानव जीवन के रिश्तों की कहानी है हमारी आधुनिकता ने इन परिंदों की जगह समाप्त कर दी है जो कभी हमारे घरों के साथ थे,आज उनके जीवन पर संकट आया है वक्त है फिर से इन रिश्तों को जोड़ने का ताकि कौवे की कांव-कांव मे फिर से हमें सुनाई देने लगे!

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