भागवत महापुराण के अनुसार, समुद्र मंथन में 14 रत्न निकले थे और उसी में माता लक्ष्मी भी थीं, यह कार्तिक मास की अमावस का दिन था किंतु एक तथ्य यह भी उल्लेखित है कि माता लक्ष्मी के अवतरण से पूर्व अलक्ष्मी निकली थीं। समुद्र से निकलने के बाद देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का चयन किया जबकि माता अलक्ष्मी ने आसुरी शक्तियों की शरण ली। इन अलक्ष्मी का चरित्र है कि जहां पहुंचती हैं वहां सब नाश कर जाती हैं। कहा जाता है कि अलक्ष्मी अपने साथ ईर्ष्या और द्वेष लेकर आती हैं। जिन घरों में हमेशा क्लेश रहता है, वहां अलक्ष्मी आती हैं।
जो घर जुए, शराब और हिंसा के अड्डे बन जाते हैं, वहां अलक्ष्मी के कदम पड़ जाते हैं। दरअसल अलक्ष्मी को देवताओं ने वरदान दिया हुआ था कि जहां कलह है वहीं रहें। ऐसे जाने कितने प्रसंग हम सभी ने घटित होते देखे हैं कि जिस किसी ने छल से, हड़प से, अनीति से , कुमार्ग से संपदा प्राप्त की है उनके यहां सदैव एक नकारात्मक किस्म का स्पंदन पसरा रहता है , अजीब सी निर्जनता। कहीं कोई असाध्य किस्म की बीमारी है तो कहीं विघटन। कहीं असमय काल का डेरा है तो कहीं किसी की बुद्धि ही मानो भ्रष्ट हो जाए।
प्रतीकात्मक रूप से हम देखते हैं कि कैसे आपके आसपास ढेर सारे लोग अलक्ष्मी की चपेट में हैं। अलक्ष्मी जैसे उनकी मति और गति को भ्रष्ट करने में लगी हुई है। अलक्ष्मी की छाया उनके जीने का ढंग और तरीका दोनों ही परिवर्तित कर देती है। ऐसे स्थानों पर आप पल भर में घुटन महसूस करने लगेंगे। भागने का मन होगा।
सूत्र यह है दीप पर्व का मौन संदेश कहता है कि हमें जीवन पथ पर आगे बढ़ना है तो अलक्ष्मी के साये से निकलना होगा। दीपावली पर इस संदेश को गहराई से मन में उतार लेना चाहिए। अन्यथा की स्थिति में तैयार रहिए।
आप सभी के जीवन में माता लक्ष्मी सुख, समृद्धि लाएं।
शुभ दीपावली
शुभ मंगल # दीप सूत्र