उत्तराखंड के साथ यह कैसा मजाक: संदेह और सवालों से भरा भविष्य!

देवभूमि उत्तराखंड जिसे देवों की भूमि माना जाता है। आज यहां के अनेक युवा लगातार अनदेखी और असुरक्षा के चलते स्वयं सहित प्रदेश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रदेश के विभिन्न चायों के ठियों पर चरस का धुआं उड़ाते यह युवा जहां भविष्य की असुरक्षा (रोजगार) व सरकारी मशीनरियों द्वारा जानबूझकर की जा रखी की अनदेखी के चलते नशे के गर्त में धसते जा रहे हैं वहीं सरकारी विभाग ना तो इस और कड़े कदम उठाते दिख रहे हैं और ना ही इस संबंध में जानकारी जुटाना या जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई कर रहे हैं।
प्रदेश के हल्द्वानी, देहरादून, उधम सिंह नगर सहित अनेक जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में दुकानों पर आसानी से मिलने वाले गो गो के पैकट या बना हुआ पेपर आसानी से उपलब्ध है जिस दुकान वाले रखते तो हैं पर जान पहचान वालों को ही उपलब्ध कराते हैं। इसका उपयोग युवा तंबाकू व चरस का मिश्रण बनाकर भरने में करते हैं और चाय की दुकान या कहीं और बड़े आसानी से जाकर सिगरेट की तरह इसका सेवन करते देखे जा सकते हैं। एक और जहां युवा भ्रांति के चलते इसे बाबा का प्रसाद कह कर पीते हुए अपनी भूमि व देवों को ही बदनाम कर रहे हैं, तो वहीं प्रशासन भी इसे लेकर आंखें मुंदा हुआ दिखता है।
पीएम मोदी का है विशेष प्रेम:
एक तरफ जहां प्रदेश सरकार उत्तराखंड को पीएम मोदी का प्रिय प्रदेश बताने से पीछे नहीं हटती। वहीं प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रिय प्रदेश को गर्त में जाने से रोकने के लिए केवल शराब पर बड़ी कार्रवाई कर अपनी पीठ थपथपाती दिखती है। ताकि उन तक भी पहुंचे कि प्रदेश को नशे से दूर रखने के प्रयास जारी है। लेकिन दुकानों में बिकने वाले यह गोगो के बने पैकेट जिस के द्वारा युवा चरस पीने के आदी हो रहे हैं। उससे या किसी भी स्थिति में युवाओं को चरस पीने से कैसे रोका जाए इस पर कोई कार्रवाई करती नहीं दिखती।
[क्या होता है गो-गो का पैकेट (गूगल में दी गई जानकारी के अनुसार):
GoCone प्री-रोल्ड कोन एक खाली कागज़ का खोल होता है जिसे उपयोगकर्ता अपनी पसंद की कानूनी धूम्रपान सामग्री, जैसे तंबाकू या हर्बल मिश्रण से भर सकते हैं। ये मूल रूप से पहले से बने “ब्लैंक सिगरेट” का विकल्प हैं, जिससे कोन को हाथ से रोल करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।]
भांग के पत्तों को मसल कर बनाई गई यह इस चरस का धुआं इतना तेज होता है कि इसे जहां कहीं किसी ने जलाया हो वहां कोई भी पहुंचता है तो काफी देर तक इसकी दुर्गंध हवा में महसूस की जा सकती है। पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली से निर्भिक हो चुके कई लोग तो प्रदेश में छड़ के रूप में आने वाली इस चरस के छोटे-छोटे टुकड़ों को तक जेब में लेकर घूमते रहते हैं।
कुल मिलाकर देवभूमि जैसी पवित्र इस धारा को बदनाम करने वाली इस स्थिति से बचने के लिए सरकार को कठोर कार्रवाई करनी ही होगी तभी देवों की इस भूमि का भविष्य सुरक्षित माना जा सकता है अन्यथा लगातार नशे के गर्त में जा रहे यहां के युवा ना तो अपनी भूमि की रक्षा कर सकेंगे और न ही यहां की संस्कृति की।
सवाल तो उठाते हैं-
इस पूरे मामले में कुछ सवाल तो उठाते ही हैं कि जब एक आमआदमी तक यह जानता है कि प्रदेश में कहां किन ठिकानों पर युवा चरस पी रहे हैं तो ऐसे में क्या यह मुमकिन है कि पुलिस या प्रशासन को इसकी जानकारी ना हो सवाल यह भी ही है कि क्या वे भी इसमें से अपने कुछ कुछ लाभ का हिस्सा निकल रहे हैं और देवताओं की इस भूमि को गर्त में धकेलने में सहयोगी बन रहे हैं।
इसके अलावा क्या जहां भी यह सब हो रहा है? वहां के जनप्रतिनिधियों को इस तरह की जानकारी नहीं पहुंच रही है, यदि पहुंच रही है तो कार्यवाही क्यों नहीं हो रही है। यदि हल्की सूचना भी मिल रही है तो अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से पता कर एक्शन से यह जनप्रतिनिधि दूरी क्यों बने हुए हैं? यह सवाल उठते हैं और उठते ही रहेंगे जब तक देवों की यह भूमि इस नशे के कारोबार से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो जाती।।
