July 6, 2026

राज्यसभा उपचुनाव में दिलचस्प हुआ बंगाल का सियासी गणित, टीएमसी में टूट के बावजूद ममता बनर्जी के समर्थन के बिना मुश्किल में ऋतब्रता गुट

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नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में राज्यसभा की तीन सीटों पर होने वाले उपचुनाव ने राज्य की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। निर्वाचन कार्यक्रम घोषित होने के साथ ही सभी दलों ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। मौजूदा विधानसभा संख्या बल को देखते हुए दो सीटों का परिणाम अपेक्षाकृत स्पष्ट माना जा रहा है, जबकि तीसरी सीट पर राजनीतिक समीकरण और संभावित क्रॉस वोटिंग चुनाव को बेहद रोचक बना सकती है।

राज्य की 294 सदस्यीय विधानसभा के आधार पर राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए लगभग 74 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी। विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास 207 विधायक हैं, जिससे वह दो उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने की स्थिति में दिखाई देती है। हालांकि तीसरी सीट पर जीत के लिए आवश्यक अतिरिक्त समर्थन जुटाना उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के पास कुल 80 विधायक हैं, लेकिन पार्टी के भीतर सामने आए राजनीतिक मतभेदों ने समीकरण को जटिल बना दिया है। इसके बावजूद माना जा रहा है कि राज्यसभा चुनाव में ममता बनर्जी का प्रभाव अभी भी निर्णायक बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके समर्थन के बिना अलग गुट के लिए राज्यसभा तक पहुंच बनाना आसान नहीं होगा।

ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से पर्याप्त विधायकों के समर्थन का दावा किया गया है। यदि इन दावों को सही माना जाए तो भी ममता बनर्जी के साथ मौजूद विधायकों की संख्या ऐसी स्थिति बना सकती है, जिससे अलग गुट के उम्मीदवार की जीत की संभावनाएं प्रभावित हों। यही कारण है कि राज्यसभा चुनाव केवल संख्या का नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति का भी मुकाबला बन गया है।

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी तीसरी सीट के लिए अपने अतिरिक्त मतों का उपयोग किसी अन्य गुट के उम्मीदवार के पक्ष में करेगी। दो उम्मीदवारों की संभावित जीत के बाद भाजपा के पास कुछ मत शेष रह सकते हैं, जिनका इस्तेमाल चुनावी रणनीति के तहत किया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी किसी दल की ओर से आधिकारिक संकेत सामने नहीं आए हैं।

तीसरी सीट का परिणाम संभावित क्रॉस वोटिंग पर भी निर्भर माना जा रहा है। यदि किसी भी दल के विधायक पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं तो चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अपने विधायकों को एकजुट रखने की कोशिश में जुट गए हैं और मतदान तक अंदरूनी गतिविधियां तेज रहने की संभावना है।

विधानसभा में भाजपा के अलावा तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायक हैं। कांग्रेस के पास दो विधायक हैं, जबकि हुमायूं कबीर की पार्टी के भी दो विधायक मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त सीपीआई और एआईएसएफ के पास एक-एक विधायक है। इन छोटी राजनीतिक ताकतों की भूमिका भी करीबी मुकाबले की स्थिति में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

राज्यसभा उपचुनाव केवल रिक्त सीटों को भरने की प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर का भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। चुनाव परिणाम यह स्पष्ट करेंगे कि टीएमसी के भीतर उभरे नए समीकरणों का वास्तविक असर कितना है और विपक्ष किस हद तक इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठा पाता है। आगामी मतदान और मतगणना पर पूरे राज्य के साथ राष्ट्रीय राजनीति की भी नजर बनी हुई है।

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