शादी से पहले संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- असफल रिश्ता किसी को नैतिक रूप से दोषी नहीं ठहरा सकता
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शादी-पूर्व संबंधों को किसी व्यक्ति के नैतिक चरित्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में ऐसे रिश्तों को केवल नैतिक दृष्टिकोण से आंकना उचित नहीं है और केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के भविष्य या करियर को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें तेलंगाना पुलिस भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक उम्मीदवार को नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था। उम्मीदवार का चयन पुलिस कांस्टेबल पद के लिए हो चुका था, लेकिन उसके खिलाफ पूर्व में दर्ज एक आपराधिक मामले को आधार बनाकर उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया था। मामला एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा था, जिसमें शादी का वादा कर संबंध बनाने और बाद में विवाह नहीं करने का आरोप लगाया गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि शिकायत और आरोपी के बीच कई वर्षों तक संबंध रहे थे तथा दोनों वयस्क थे। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था और मामला विधिक प्रक्रिया के तहत समाप्त कर दिया गया था। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने उम्मीदवार की नियुक्ति को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वह नैतिक पतन से जुड़े अपराध में शामिल रहा है और पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने भर्ती बोर्ड के इस दृष्टिकोण पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को नैतिक पतन से जुड़े अपराध का दोषी मानने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते। यह साबित होना आवश्यक है कि अपराध वास्तव में हुआ हो और संबंधित व्यक्ति की उसमें स्पष्ट भूमिका रही हो। केवल शिकायत दर्ज होने या बाद में समझौता हो जाने को दोष स्वीकार करने के समान नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि उम्मीदवार ने अपने सत्यापन प्रपत्र में मामले की जानकारी छिपाई नहीं थी। उसने पूरी पारदर्शिता के साथ सभी तथ्यों का उल्लेख किया था। ऐसे में उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि सरकारी नियोक्ता उम्मीदवार की उपयुक्तता का परीक्षण कर सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया तथ्यों और कानून पर आधारित होनी चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों या धारणाओं पर।
फैसले में अदालत ने सामाजिक बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में विवाह से पहले बने सहमति आधारित रिश्ते असामान्य नहीं हैं। ऐसे संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र या नैतिकता का अंतिम पैमाना नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून दो अविवाहित बालिग व्यक्तियों को अपनी इच्छा से संबंध बनाने से नहीं रोकता। इसलिए केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को नैतिक रूप से दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि हर रिश्ता विवाह तक पहुंचे, यह आवश्यक नहीं है। किसी संबंध का समाप्त हो जाना अपने आप में धोखाधड़ी या आपराधिक कृत्य का प्रमाण नहीं बनता। मानवीय संबंध जटिल होते हैं और हर असफल संबंध को अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार का
