June 4, 2026

दिल्ली में अब बैग उठाने की टेंशन खत्म… दो मम्म‍ियों ने बाजारों में उतारा कैरीमेन

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नई दिल्ली।
दिल्ली (Delhi) के सरोजनी नगर, लाजपत नगर या चांदनी चौक के मुहाने पर खड़े होकर गौर से देखें तो एक बड़ा ही दिलचस्प नजारा दिखता है. एक तरफ वो पति, दोस्त या बॉयफ्रेंड्स हैं, जो शॉपिंग बैग्स (Shopping bags) के बोझ तले दबे, रीढ़ की हड्डी को 45 डिग्री पर झुकाए, चेहरे पर ‘मुझे घर जाना है’ वाले भाव लिए घूम रहे हैं. और दूसरी तरफ… एक नई नस्ल का उदय हुआ है- नाम है ‘कैरीमैन (Carryman)’. जो न फुल टाइम सैलरी (Full time salary) पर जॉब कर रहे हैं, बल्क‍ि हैप्पी कस्टमर वाली संतुष्ट‍ि भी बटोर रहे।

शॉपिंग का ये वो गंभीर मोड़ है जहां अमूमन एक लंबा पारिवारिक झगड़ा शुरू होता है, लेकिन दो मम्म‍ियों के एक अनोखे बिजनेस आइडिया ने इस ‘वेटलिफ्टिंग’ को एक बेहद दिलचस्प स्टार्टअप में बदल दिया है. सोशल मीडिया पर इस सर्विस की तस्वीरें और रील्स इस कदर वायरल हो रही हैं कि लोग इसकी क्रिएटिविटी को सलाम कर रहे हैं।


जब दो सहेलियों के ‘मॉम गिल्ट’ से निकला लाख टके का आइडिया

इस अनोखे स्टार्टअप की कहानी किसी कॉरपोरेट रूम में नहीं, बल्कि बच्चों के प्रैम और भारी शॉपिंग बैग्स से जूझते हुए लाजपत नगर की सड़कों पर लिखी गई. इस स्टार्टअप की को-फाउंडर रितु कंदारी श्रीवास्तव और कनिष्का मल्होत्रा ने बताया कि वे दोनों छोटे बच्चों की मां हैं. पिछले साल जब वे लाजपत नगर बाजार गईं, तो बच्चों के प्रैम को संभालना और साथ में भारी-भरकम शॉपिंग बैग्स को ढोना उनके लिए एक दुःस्वप्न जैसा हो गया था।

उन्होंने वहां एक बुजुर्ग महिला को भी सामान से हांफते देखा. रितु के मुताबिक तभी हमारे मन में आया कि काश कोई ऐसी सर्विस होती जहां हम कुछ पैसे देकर मदद ले पाते, ताकि हमें शॉपिंग पर जाने के लिए अपने घरवालों के आगे हाथ न फैलाना पड़े. बस इसी जरूरत ने ‘कैरीमैन’ को जन्म दे दिया. उन्होंने नगर निगम और पुलिस से बकायदा इजाजत ली, युवाओं को ट्रेनिंग दी और लाजपत नगर में अपना पहला कियोस्क खोल दिया।


‘पत्नियों का अरमान और पतियों का सहारा’: सोशल मीडिया पर हो रही तारीफ

ये स्टार्ट अप शुरू होने के साथ ही इंटरनेट पर ये सर्विस इस कदर छा गई है कि दिल्ली के मिजाज को समझने वाले यूजर्स इस पर मजेदार पोस्ट और अनुभव लिख रहे हैं.यूजर दीपाली पोरवाल ने लाजपत नगर के सेंट्रल मार्केट का एक मजेदार आंखों देखा हाल बयां करते हुए अपने सोशल मीडिया पर लिखा कि दृश्य यह था कि कविता जी आगे-आगे चल रही थीं, उनकी नजरें कुर्तियों के डिस्काउंट बोर्ड पर थीं. उनके ठीक 3 कदम पीछे उनके पति शर्मा जी चल रहे थे, जिनके दोनों हाथों में पहले से ही 6 बैग्स थे।

शर्मा जी के मुंह से कराह निकली- ‘कविता, अब और नहीं! यह शॉपिंग है या वेटलिफ्टिंग?’ तभी नीली टी-शर्ट पहने ‘कैरीमैन’ राहुल की एंट्री होती है. शर्मा जी ने राहुल को ऐसे देखा जैसे कोई डूबता हुआ इंसान लाइफ-जैकेट को देखता है. 149 रुपये में शर्मा जी को जो सुख मिला, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी लग्जरी स्पा से नहीं की जा सकती. अब शर्मा जी आजाद थे, गोलगप्पे खा रहे थे और पत्नी से कह रहे थे-‘अरे सुनो, वो कोने वाली दुकान पर भी अच्छा कलेक्शन है, वहां भी देख लो!’

वहीं, नीतू मिश्रा नाम की यूजर ने इस सर्विस को दुनियाभर के पतियों के लिए ‘मुक्ति का मार्ग’ बताते हुए पोस्ट किया, ‘भाई! दुनियाभर के पतियों और बॉयफ्रेंड्स के लिए खुशखबरी है. अब शॉपिंग में बीवी या गर्लफ्रेंड के शॉपिंग बैग नहीं उठाने पड़ेंगे. आप चाहें तो उन्हें अपना क्रेडिट, डेबिट कार्ड देकर अकेले भी शॉपिंग पर भेज सकते हैं! मैंने सर्च किया तो पाया कि यह सिर्फ ₹149 प्रति घंटा में आपका 12 किलो तक का भारी बैग उठाएगा, लंबी लाइनों में आपकी जगह खड़ा रहेगा और फूड स्टॉल से खाना भी लाएगा. थक जाएं तो आपके लिए फोल्डिंग चेयर और धूप से बचाने के लिए छाता भी लगाएगा।

वहीं यूजर आशीष प्रमोद गोस्वामी और सीमा त्यागी ने भी इसके किरायों की लिस्ट साझा करते हुए बताया कि कैसे यह सेवा 2 घंटे के लिए 219 रुपये और 3 घंटे के लिए 319 रुपये में उपलब्ध है, जो ग्राहकों को दुकानों में बैठने की जगह ढूंढने और सामान को मेट्रो स्टेशन तक पहुंचाने में भी मदद करती है.

यूजर कल्पना प्रसाद लिखती हैं कि अब दिल्ली की शॉपिंग होगी बिल्कुल टेंशन-फ्री! न पति को परेशान करना पड़ेगा, न हाउस हेल्प का इंतजार.यह सिर्फ सामान उठाना नहीं, कैरीमेन एक सम्मानजनक व्यवस्था है।


कैरीमेन ने रखा अपना पक्ष

इस पूरे शोर और लोकप्रियता के बीच खुद ‘कैरीमैन’ ने भी सोशल मीडिया पर अपना विजन साफ करते हुए लिखा है कि कैरीमैन सिर्फ शॉपिंग में मदद करने वाली सर्विस नहीं है. हमारा मानना है कि भारतीय बाजारों में शॉपिंग आरामदायक होनी चाहिए, भीड़भाड़ वाले इलाकों में परिवार खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें और हर काम को एक सम्मान और एक स्ट्रक्चर मिलना चाहिए. हम सिर्फ एक सर्विस नहीं, एक पूरा सिस्टम बना रहे हैं.


फुल टाइम पर कर रहे काम

एक रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई कि कैरीमेन स्टार्टअप में इन युवाओं को प्रॉपर फुल-टाइम सैलरी पर रखा गया है, वे कोई दिहाड़ी या ‘गिग वर्कर्स’ नहीं हैं. 18 साल के एक ‘कैरीमैन’ आनंद कुमार ने बताया कि पहले वे साड़ी की दुकान में हेल्पर थे, लेकिन यहां उन्हें बेहतर पैसे के साथ-साथ ग्राहकों से पूरा ‘सम्मान’ और भरोसा मिलता है।

वैसे देखा जाए तो ये स्टार्टअप केवल दो सहेलियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि भारतीय बाजारों की बुनियादी कमियों जैसे टूटे फुटपाथ, बेतरतीब भीड़ और पार्किंग की किल्लत के बीच से भी कैसे ‘जुगाड़’ और ‘इनोवेशन’ का एक नया रास्ता निकाला जा सकता है।

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