July 16, 2026

न्यायिक गरिमा और आचार संहिता पर उठे गंभीर सवाल: कार्यकाल के दौरान गैस एजेंसी चलाने के विवाद में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश

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नई दिल्ली । देश की उच्च न्यायपालिका में संवैधानिक पदों पर आसीन न्यायाधीशों के लिए निर्धारित नैतिक आचार संहिता और नियमों की अनदेखी का एक अत्यंत संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और बाद में मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दे चुके एक सेवानिवृत्त जस्टिस अपने लगभग 16 वर्षों के लंबे न्यायिक कार्यकाल के दौरान समानांतर रूप से एक एलपीजी गैस वितरण एजेंसी का संचालन भी करते रहे। इस पूरे मामले का आधिकारिक भंडाफोड़ सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़े एक डीलरशिप विवाद और एजेंसी के पूर्व प्रबंधक की विधवा द्वारा उच्च न्यायालय में दायर की गई एक रिट याचिका के माध्यम से हुआ है, जिसने न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

प्राप्त विवरणों और दस्तावेजों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ने वर्ष 1984 में संबंधित व्यक्ति को किचन फ्लेम के नाम से एक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप आवंटित की थी। स्थापित नियमों और अलिखित न्यायिक आचार संहिता के अनुसार, संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के लिए यह अनिवार्य माना जाता है कि उनका सरकार, निजी पक्षों अथवा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ किसी भी प्रकार का आर्थिक, व्यावसायिक या संविदात्मक संबंध नहीं होना चाहिए ताकि हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो। इसके बावजूद, संबंधित न्यायाधीश नवंबर 2024 में मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने तक इस व्यावसायिक गैस एजेंसी के वैधानिक मालिक बने रहे, जिसे प्रथम दृष्टया स्थापित सेवा नियमों और नैतिक मापदंडों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।

अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक पदों पर आसीन रहने के बावजूद इस व्यावसायिक समझौते को समय-समय पर नवीनीकृत भी कराया जाता रहा। संबंधित न्यायाधीश ने अस्सी के दशक के मध्य में एक अधिवक्ता के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी, जिसके बाद वर्ष 2008 में वे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए और वर्ष 2023 में पदोन्नत होकर मुख्य न्यायाधीश बने। इस पूरे सफर के दौरान गैस एजेंसी के अनुबंध को कई बार रिन्यू कराया गया, जिसकी वैधता वर्ष 2030 तक के लिए बढ़ा दी गई थी। तेल कंपनी के साथ हुए सबसे हालिया समझौते के आधिकारिक स्टाम्प पेपर पर संबंधित न्यायाधीश के हस्ताक्षर और तस्वीरें भी मौजूद पाई गईं, जो इस व्यावसायिक गतिविधि में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता को प्रमाणित करती हैं।

इस पूरे गुत्थी का खुलासा तब हुआ जब उक्त गैस एजेंसी का कामकाज संभालने वाले पूर्व प्रबंधक की विधवा ने मालिकाना हक को अपने नाम पर स्थानांतरित करने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली। इसी विधिक प्रक्रिया के दौरान दिसंबर 2025 में प्रशासन के पास एक आधिकारिक जनशिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि गैस एजेंसी के वास्तविक मालिक एक पूर्णकालिक न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे हैं। इस गंभीर शिकायत के आधार पर तेल कंपनी ने संबंधित पूर्व न्यायाधीश को लगातार कई कारण बताओ नोटिस जारी किए। कंपनी का स्पष्ट रुख था कि बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी संवैधानिक पद पर रहते हुए व्यावसायिक एजेंसी चलाना नियमों का उल्लंघन है, इसलिए क्यों न इस आवंटन को रद्द कर दिया जाए।

न्यायिक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी संबंधित व्यक्ति की ओर से तेल कंपनी द्वारा जारी किए गए किसी भी कारण बताओ नोटिस का कोई विधिक जवाब दाखिल नहीं किया गया। अंततः प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए जुलाई के प्रथम सप्ताह में किचन फ्लेम नामक इस एलपीजी डीलरशिप के लाइसेंस को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। लाइसेंस सस्पेंड होने के बाद पीड़ित परिवार ने दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिनका तर्क है कि मूल आवंटनकर्ता की गलतियों और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण उन्हें बेवजह आर्थिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह पूरा मामला एक ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायपालिका पहले से ही कुछ अन्य आंतरिक विवादों के कारण असहज स्थिति का सामना कर रही है, और इस नए घटनाक्रम ने न्यायिक शुचिता पर बहस को और तेज कर दिया है।

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