लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग
विपक्षी गठबंधन ने अपनी रणनीतिक रूपरेखा को और अधिक धार देते हुए हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलित छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई तथा अयोध्या में राम मंदिर दान प्रक्रिया से जुड़े विवादों को प्राथमिक मुद्दे के रूप में उभारा है। विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग है कि देश के केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं सदन के पटल पर उपस्थित होकर इस समूचे घटनाक्रम पर सरकार का स्पष्ट पक्ष रखें। इसके अतिरिक्त, मंदिर में अर्पित चढ़ावे तथा वित्तीय लेनदेन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी बिना किसी विलंब के स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा कराने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि जनसंशय दूर हो सके।
संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की सदन में निरंतर अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था में जनता से सीधे जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों का कहना है कि सरकार को विपक्ष के तर्कसंगत प्रश्नों का उत्तर देने से बचने के बजाय सकारात्मक रुख अपनाते हुए खुले संवाद की पहल करनी चाहिए, जिससे जारी गतिरोध को समाप्त किया जा सके।
दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल का मानना है कि निरंतर व्यवधान और विरोध के कारण देश से जुड़े कई अति आवश्यक विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि, इस भारी राजनीतिक खींचातान के मध्य भी लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी से संबंधित महत्वपूर्ण कानून को पारित करा लिया गया। इसके साथ ही देश की बैंकिंग प्रणाली में आधुनिक डिजिटल तकनीक एवं क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को कानूनी मान्यता प्रदान करने वाले एक नए बैंकिंग संशोधन विधेयक को भी पटल पर प्रस्तुत किया गया। सत्तापक्ष का दावा है कि विपक्ष जनकल्याणकारी कानूनों पर बहस करने के बजाय केवल व्यवधान पैदा कर रहा है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी रणनीति की तीखी आलोचना करते हुए दोहराया है कि सरकार नियमानुसार सभी जनहितकारी विषयों पर सार्थक और स्वस्थ बहस के लिए पूरी तरह तत्पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल वास्तव में गंभीर चर्चा से भाग रहे हैं और केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से नारेबाजी का सहारा ले रहे हैं। उनका तर्क था कि संसद को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का केंद्र बनाने के स्थान पर जनहित में विधेयकों को विचार-विमर्श के पश्चात पारित कराने में रचनात्मक योगदान दिया जाना चाहिए।
इसी बीच, संसद भवन परिसर स्थित मकर द्वार के निकट विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर जोरदार प्रदर्शन किया और तख्तियां दिखाकर नारेबाजी की। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक भी इस निरंतर जारी संसदीय गतिरोध पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में भी दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम सहमति न बन पाने के कारण यह स्पष्ट है कि मॉनसून सत्र के आगामी दिनों में भी सामान्य कामकाज बहाल होना काफी मुश्किल दिखाई दे रहा है।
