वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
याचिका में केंद्र सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई है, जिसमें वंदे मातरम के छह पदों के गायन को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को लेकर संवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए हैं।
टीएम कृष्णा की ओर से अदालत में कहा गया कि वंदे मातरम के चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। याचिका में तर्क दिया गया है कि लोगों को इन पदों का गायन करने के लिए बाध्य करना धार्मिक और वैचारिक समर्थन के लिए मजबूर करने के समान हो सकता है।
याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से जुड़े हालिया संशोधन को भी चुनौती दी गई है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या इस तरह का प्रावधान कानून के स्तर पर लागू किया जा सकता है और इसके तहत किसी व्यक्ति पर गायन के लिए दबाव बनाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू की जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। अदालत ने हालांकि इस चरण पर यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत को केवल दो अंतरों तक सीमित रखा जाना चाहिए या छह अंतरों तक इसका गायन किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने इस विषय को याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों के संदर्भ में देखा।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान कानून बनाए जाने से जुड़े तर्क रखे। वहीं याचिका में उस संशोधन को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े कानून के दायरे में लाने की बात कही गई है।
याचिकाकर्ता ने इस संशोधन को मनमाना बताते हुए अदालत से इसकी संवैधानिक वैधता की जांच करने की मांग की है। याचिका का मुख्य सवाल यह है कि राष्ट्रीय गीत के गायन को किस सीमा तक अनिवार्य किया जा सकता है और ऐसा नहीं करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया है, जिसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।
मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन का प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा। अदालत अब केंद्र के जवाब के बाद इन मुद्दों पर आगे विचार करेगी।
