ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, NavIC से सेना की नेविगेशन क्षमता होगी मजबूत, 1500 किलोमीटर तक बढ़ेगी पहुंच
NVS-03 को भारत की भौगोलिक सीमा से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक फैले NavIC के कवरेज क्षेत्र में नेविगेशन सेवाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस प्रणाली के जरिए सशस्त्र बलों को रणनीतिक अभियानों के दौरान स्थान और दिशा से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके अलावा सड़क, हवाई और समुद्री परिवहन सहित कई नागरिक क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
ISRO के अनुसार, GSLV-F18 रॉकेट की यह 20वीं उड़ान थी। प्रक्षेपण के लगभग 18 मिनट 40 सेकंड बाद रॉकेट ने 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया। हालांकि, सैटेलाइट को पूरी तरह सक्रिय होने से पहले अपनी निर्धारित परिचालन कक्षा तक पहुंचने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफल प्रक्षेपण पर ISRO के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के समर्पण और उनकी तकनीकी क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयास देश को लगातार गौरवान्वित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के मिशन महत्वपूर्ण तकनीकों में भारत की आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाते हैं।
NVS-03 दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट समूह का तीसरा उपग्रह है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक शामिल है। सैटेलाइट में भारत में विकसित एटॉमिक क्लॉक के साथ आयातित एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई हैं। नेविगेशन प्रणाली में सटीक समय की गणना बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर उपग्रहों से मिलने वाले संकेतों के जरिए किसी स्थान की स्थिति निर्धारित की जाती है।
इस सैटेलाइट में L1 फ्रीक्वेंसी का नया सिग्नल भी शामिल किया गया है। इससे पहले NavIC में L5 और S-बैंड सिग्नल का इस्तेमाल किया जाता था। L1 सिग्नल जुड़ने से इस प्रणाली की अनुकूलता अधिक उपकरणों और नेविगेशन रिसीवर के साथ बढ़ेगी। इससे आम नागरिकों के लिए मोबाइल और अन्य नेविगेशन सेवाओं में भी इसका उपयोग आसान हो सकता है।
NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। इसे ISRO ने भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित किया है। अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS, यूरोप के Galileo और चीन के BeiDou की तरह यह भी लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसकी दो प्रमुख सेवाएं हैं। Standard Positioning Service आम नागरिकों और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए है, जबकि Restricted Service अधिकृत रणनीतिक और रक्षा उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड सेवा प्रदान करती है।
भारत को अपने स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम की जरूरत 1999 के कारगिल युद्ध के अनुभव के बाद विशेष रूप से महसूस हुई थी। उस समय दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सटीक लोकेशन और सैन्य गतिविधियों की जानकारी के लिए आधुनिक नेविगेशन तकनीक की आवश्यकता सामने आई। विदेशी GPS सेवाओं पर निर्भरता ने भी स्वतंत्र प्रणाली विकसित करने के रणनीतिक महत्व को उजागर किया। इसी दिशा में Indian Regional Navigation Satellite System परियोजना शुरू हुई, जिसे बाद में NavIC नाम दिया गया।
NVS-03 का प्रक्षेपण जनवरी 2025 में NVS-02 मिशन के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद भी महत्वपूर्ण है। NVS-02 को ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया था, लेकिन तकनीकी समस्या के कारण वह निर्धारित परिचालन कक्षा तक नहीं पहुंच सका। जांच में ऑर्बिट बढ़ाने वाले इंजन की ऑक्सीडाइजर लाइन के पायरो वाल्व तक जरूरी ड्राइव सिग्नल नहीं पहुंचने की बात सामने आई थी। इसके बाद भविष्य के मिशनों में सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ाने की सिफारिशें की गई थीं।
NVS-03 अब अपनी निर्धारित जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचने के लिए ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से ऑर्बिट मैन्यूवर करेगा। इसके बाद उपकरणों और नेविगेशन संकेतों की जांच होगी। इन प्रक्रियाओं के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद ही इसकी नियमित सेवाएं शुरू हो सकेंगी। दूसरी पीढ़ी के इस कार्यक्रम में NVS-01 और NVS-02 के बाद NVS-03 को शामिल किया गया है। आगे NVS-04 और NVS-05 के प्रक्षेपण की भी योजना है। इन उपग्रहों के जरिए भारत NavIC की क्षमता, विश्वसनीयता और सेवाओं की निरंतरता को और मजबूत करना चाहता है।
