IIT मद्रास के छह वैज्ञानिकों को जेसी बोस अनुदान: भारत के अत्याधुनिक अनुसंधान को मिली बड़ी राष्ट्रीय पहचान
दरअसल, यह उपलब्धि इन छह वैज्ञानिकों के व्यक्तिगत शोध सम्मान तक सीमित नहीं है। यह भारत में उच्च स्तरीय, दीर्घकालिक और समस्या-समाधान आधारित अनुसंधान को मिल रही बढ़ती राष्ट्रीय प्राथमिकता का संकेत भी है। जिन छह प्रोफेसरों को यह अनुदान मिला है, उनका शोध कृत्रिम अंग और पुनर्वास तकनीक, स्वच्छ पेयजल, अगली पीढ़ी का ऑप्टिकल संचार, कार्बन कैप्चर, चिकित्सा उपकरण तथा अत्याधुनिक बोरॉन रसायन विज्ञान जैसे क्षेत्रों से जुड़ा है।चयनित वैज्ञानिकों में प्रो. सुजाता श्रीनिवासन, प्रो. थलप्पिल प्रदीप, प्रो. दीपा वेंकटेश, प्रो. जितेंद्र एस. सांगवाई, प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन और प्रो. सुंदरगोपाल घोष शामिल हैं।
छह वैज्ञानिक, छह अलग क्षेत्र- एक साझा लक्ष्य: भारत को ज्ञान और तकनीक में आगे ले जाना
आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामाकोटी ने चयनित वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह संस्थान में महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान एवं विकास को दर्शाता है। इन छह वैज्ञानिकों के शोध की विविधता आईआईटी मद्रास की अनुसंधान क्षमता की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करती है। एक ओर जहां प्रो. सुजाता श्रीनिवासन का काम दिव्यांगजनों और गतिशीलता संबंधी चुनौतियों से जूझ रहे लोगों के जीवन को आसान बनाने वाली तकनीकों पर केंद्रित है, वहीं प्रो. थलप्पिल प्रदीप का शोध देश के सामने मौजूद स्वच्छ पेयजल की चुनौती के तकनीकी समाधान खोज रहा है। दूसरी ओर प्रो. दीपा वेंकटेश भारत की उच्च क्षमता वाली ऑप्टिकल संचार व्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं और प्रो. जितेंद्र एस. सांगवाई ऊर्जा तथा कार्बन प्रबंधन से जुड़ी जटिल चुनौतियों पर काम कर रहे हैं।
इसी तरह प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन का शोध चिकित्सा उपकरणों और मानव शरीर के मस्तिष्क-मांसपेशी संबंधी कार्यों को समझने में मदद कर रहा है, जबकि प्रो. सुंदरगोपाल घोष का काम उन्नत बोरॉन रसायन विज्ञान और भविष्य की रासायनिक तकनीकों के लिए नए रास्ते खोल रहा है।
कृत्रिम अंगों को भारतीय जरूरतों के अनुरूप बनाने वाली सुजाता श्रीनिवासन
मैकेनिकल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर सुजाता श्रीनिवासन कृत्रिम अंग, सहायक प्रौद्योगिकी और पुनर्वास उपकरणों के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रही हैं। वे TTK सेंटर फॉर रिहैबिलिटेशन रिसर्च एंड डिवाइस डेवलपमेंट (R2D2) तथा नेशनल सेंटर फॉर असिस्टिव हेल्थ टेक्नोलॉजीज से जुड़ी हैं।
उनकी टीम ने भारतीय परिस्थितियों और जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए अनेक किफायती सहायक उपकरण विकसित किए हैं। इनमें NeoFly-NeoBolt प्रणाली, स्टैंडिंग व्हीलचेयर, Kadam कृत्रिम घुटना और YD One हल्की व्हीलचेयर उल्लेखनीय हैं। उनके शोध का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को वास्तविक उपयोग तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया है। उनके नाम कृत्रिम अंगों और सहायक प्रौद्योगिकी से जुड़े कई भारतीय, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय पेटेंट भी हैं।
करोड़ों लोगों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने वाले शोध की पहचान
रसायन विज्ञान के प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप भारत में स्वच्छ जल तकनीक के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम हैं। उनका शोध नैनोमटेरियल्स, माइक्रोड्रॉपलेट्स, आइस केमिस्ट्री और विशेष रूप से किफायती जल शोधन तकनीकों से जुड़ा है।
उनके शोध का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह है कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। उन्हें पद्म श्री, विज्ञान श्री, एनी पुरस्कार और विनफ्यूचर पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने आईआईटी मद्रास रिसर्च पार्क में इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लीन वाटर की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जेसी बोस अनुदान का यह उनका तीसरा पांच वर्षीय कार्यकाल है।
ऑप्टिकल संचार में स्वदेशी क्षमता का निर्माण
इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की प्रोफेसर दीपा वेंकटेश उच्च क्षमता वाले ऑप्टिकल कम्युनिकेशन, माइक्रोवेव फोटोनिक्स और ऑप्टिकल सिग्नल प्रोसेसिंग में विशेषज्ञता रखती हैं। वे एडवांस्ड ऑप्टिकल कम्युनिकेशन टेस्टबेड की प्रोजेक्ट लीड हैं।
दूरसंचार विभाग के समर्थन से चल रही इस पहल के तहत आईआईटी मद्रास में मल्टीकोर फाइबर के साथ देश का पहला फील्ड टेस्टबेड स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य भारत में ऑप्टिकल संचार के क्षेत्र में स्वदेशी समाधान विकसित करने और तकनीकी मानकीकरण को आगे बढ़ाना है। वे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी नवाचार राष्ट्रीय फैलोशिप की प्राप्तकर्ता भी हैं।
कार्बन कैप्चर से ऊर्जा सुरक्षा तक सांगवाई का शोध
केमिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर जितेंद्र एस. सांगवाई का अनुसंधान वर्तमान वैश्विक ऊर्जा और जलवायु चुनौतियों से सीधे जुड़ा है। उनका प्रमुख शोध क्षेत्र कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड सीक्वेस्ट्रेशन (CCUS), गैस हाइड्रेट्स और अपस्ट्रीम ऑयल एंड गैस इंजीनियरिंग है।
वे 200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं और उनके शोध कार्यों को लगभग 11,000 उद्धरण प्राप्त हुए हैं। उनके नाम 43 पेटेंट भी हैं। वे भारतीय राष्ट्रीय अभियांत्रिकी अकादमी और राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत के फेलो हैं।
चिकित्सा तकनीक में मानव शरीर को समझने का प्रयास
प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन का शोध बायोमेडिकल उपकरणों और मस्तिष्क तथा मांसपेशियों के कार्यों के विश्लेषण से जुड़ा है। उनका प्रयास चिकित्सा उपकरणों को अधिक वैज्ञानिक, सटीक और नैदानिक रूप से उपयोगी बनाने पर केंद्रित रहा है।
उन्होंने अपने करियर में 50 से अधिक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है और 550 से अधिक शोध लेख प्रकाशित किए हैं। चिकित्सा उपकरणों के नियमों और मानकों के वैश्विक सामंजस्य के वे प्रमुख समर्थक हैं और इस विषय से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं।
बोरॉन रसायन विज्ञान में नई संभावनाओं की तलाश
रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर सुंदरगोपाल घोष संक्रमण धातु-बोरॉन रसायन विज्ञान में अग्रणी अनुसंधान कर रहे हैं। उनका काम बोरॉन-युक्त आणविक प्रणालियों के संश्लेषण, संरचना, इलेक्ट्रॉनिक बंधन और रासायनिक प्रतिक्रियाशीलता को समझने पर केंद्रित है।
उन्होंने 325 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और उनका शोध विशेष रूप से उत्प्रेरण तथा छोटे अणुओं के सक्रियण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है। वे भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारतीय विज्ञान अकादमी तथा राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत के विशिष्ट फेलो हैं।
पांच वर्षों तक शोध को मिलेगा मजबूत आधार
ANRF जेसी बोस अनुदान वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को उनके उत्कृष्ट शोध प्रदर्शन के आधार पर प्रदान किया जाता है। चयन में शोध प्रकाशन, पेटेंट, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, शोध परिणाम, अनुदान और वैज्ञानिक उत्कृष्टता के अन्य मानकों को ध्यान में रखा जाता है।
इस अनुदान के तहत चयनित वैज्ञानिकों को पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष 25 लाख रुपये की सहायता मिलती है। इसका उपयोग मानव संसाधन, उपकरण, उपभोग्य सामग्री, यात्रा, आकस्मिक खर्च और अन्य शोध आवश्यकताओं के लिए किया जा सकता है, साथ ही संस्थागत ओवरहेड सहायता भी उपलब्ध होती है।
उल्लेखनीय है कि आईआईटी मद्रास के छह वैज्ञानिकों का एक साथ इस प्रतिष्ठित अनुदान के लिए चयन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारत का वैज्ञानिक अनुसंधान अब प्रयोगशालाओं और शोध पत्रों से निरंतर आगे बढ़ते हुए कृत्रिम अंगों से लेकर स्वच्छ जल, डिजिटल संचार से लेकर स्वच्छ ऊर्जा और चिकित्सा तकनीक से लेकर उन्नत रसायन विज्ञान तक, भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान तेजी से उन क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ रहा है, जोकि आने वाले दशकों में भारत की सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी शक्ति को निर्धारित करेंगे।
