March 9, 2026

'मुसलमान रिक्शावाला अगर 5 रुपये मांगे तो उसे 4 रुपये दो', हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर भड़की कांग्रेस

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नई दिल्ली । असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के एक विवादित बयान ने देश की राजनीति में नया बवंडर खड़ा कर दिया है। मुस्लिम समुदाय को लेकर की गई टिप्पणी पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और मुख्यमंत्री पर संविधान की शपथ का उल्लंघन करने तथा समाज में नफरत फैलाने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने इस मामले में भाजपा और आरएसएस को भी कटघरे में खड़ा किया है।

रिक्शावाले वाले बयान पर कांग्रेस का तीखा हमला

कांग्रेस ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हिमंता बिस्वा सरमा का एक वीडियो साझा किया, जिसमें वे कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं, “अगर कोई मुसलमान रिक्शावाला 5 रुपये मांगे तो उसे 4 रुपये दो… खूब परेशान करो।”
इस वीडियो को साझा करते हुए कांग्रेस ने कहा कि यह बयान न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि समाज को बांटने वाला और नफरत फैलाने वाला है।

‘संविधान और गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला’

कांग्रेस ने अपने बयान में कहा,
“यह घटिया बयान असम के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाडले हिमंता बिस्वा सरमा का है। वे संविधान की शपथ लेकर उसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं। यह भाजपा-आरएसएस की नफरती सोच का प्रतिबिंब है। यह बयान बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान और हमारी गंगा-जमुनी तहजीब पर सीधा हमला है।”
पार्टी ने मांग की कि इस बयान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पूरे देश से माफी मांगें।

‘मियां’ समुदाय को लेकर पहले भी दे चुके हैं बयान

यह पहला मौका नहीं है जब असम के मुख्यमंत्री अपने बयानों को लेकर विवादों में आए हों। इससे पहले मंगलवार (27 जनवरी 2026) को डिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने मतदाता सूची के विशेष संशोधन (एसआईआर) को लेकर कहा था कि इस प्रक्रिया से किसी असमिया नागरिक को दिक्कत नहीं हो रही, बल्कि केवल ‘मियां’ (बांग्ला भाषी मुस्लिम) समुदाय को ही परेशानी है।

‘बांग्लादेश में वोट दें’ वाले बयान ने बढ़ाया विवाद

हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी कहा था कि ‘मियां’ समुदाय के लोगों को असम में वोट देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और उन्हें बांग्लादेश में वोट देना चाहिए। उन्होंने कहा,
“हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे असम में वोट न दे सकें। अगर उन्हें दिक्कत हो रही है, तो हमें क्यों चिंता करनी चाहिए?”

राजनीतिक और सामाजिक असर पर सवाल

मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसे बयान सामाजिक सौहार्द, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। वहीं, यह मुद्दा आने वाले समय में असम की राजनीति में और तीखा होने के संकेत दे रहा है।

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