पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव पर जताई चिंता…, बोले- हाशिए पर चले जाएंगे छोटे दल…
नई दिल्ली। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (‘One Nation, One Election’) के प्रस्ताव पर संसद की संयुक्त समिति (JPC) को अपनी राय देते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (Former Chief Justice of India- CJI) धनंजय वाई. चंद्रचूड़ (Dhananjaya Y. Chandrachud) ने कई गंभीर संवैधानिक और लोकतांत्रिक चिंताएं जाहिर की हैं। उन्होंने विशेष रूप से छोटे और क्षेत्रीय दलों (Small and Regional Parties) के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह जानकारी इस मामले से परिचित लोगों ने गुरुवार को दी।
JPC की अगली बैठक 11 जुलाई को प्रस्तावित है, जिसमें पूर्व CJI जे.एस. खेहर और धनंजय चंद्रचूड़ दोनों को आमंत्रित किया गया है। समिति 129वां संविधान संशोधन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित विधेयक की समीक्षा कर रही है, जिनका उद्देश्य देशभर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का एकसाथ आयोजन सुनिश्चित करना है। 39 सदस्यों वाली इस JPC की अध्यक्षता भाजपा नेता पी.पी. चौधरी कर रहे हैं। समिति का गठन दिसंबर 2024 में किया गया था और अब इसका कार्यकाल मॉनसून सत्र के पहले सप्ताह तक बढ़ा दिया गया है।
चुनावों को एक साथ करने का प्रस्ताव भाजपा के 2024 के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका समर्थन किया है। उनका तर्क है कि इससे चुनाव की लागत कम होगी और शासन पर ध्यान केंद्रित होगा। लेकिन इस प्रस्ताव का कई राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध किया है, जिनका आरोप है कि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही और संघवाद को नुकसान पहुंचेगा। विधेयक में 2029 में प्रक्रिया शुरू करने और 2034 में पहले एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव है।
चंद्रचूड़ की बड़ी आपत्तियां
सूत्रों के अनुसार, पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने अप्रैल में समिति को दिए अपने लिखित सुझावों में चेताया है कि एकसाथ चुनाव कराने से बेहतर संसाधनों वाले राष्ट्रीय दलों को फायदा मिलेगा, जिससे छोटे या क्षेत्रीय दलों के लिए राजनीतिक मुकाबला असमान हो सकता है। अप्रैल में जेपीसी को दिए गए अपने निवेदन में उन्होंने बताया कि एक साथ चुनाव कराने की चिंता से छोटे या क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर जाने की संभावना है, क्योंकि बेहतर संसाधन वाले राष्ट्रीय दलों का प्रभुत्व है, जो एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहलू है, जिस पर विधायी ध्यान देने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, “चुनावी खर्च से जुड़े नियमों को सख्त किया जाना चाहिए। वर्तमान में उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा तो तय है, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा किए गए खर्च पर कोई स्पष्ट सीमा नहीं है। यह असंतुलन चुनावी प्रक्रिया को धनबल वाले दलों के पक्ष में झुका देता है।” राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसे क्षेत्रीय दलों के एक समूह ने पहले ही आरोप लगाया है कि प्रस्तावित कानून संघवाद को नुकसान पहुंचा सकता है। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व सीजेआई ने कहा, “राजनीतिक दलों के बीच समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए, चुनावी अभियान को नियंत्रित करने वाले नियमों, विशेष रूप से अभियान वित्त से संबंधित नियमों को मजबूत किया जाना चाहिए।”
मतदाताओं के अधिकार और प्रतिनिधित्व
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा चंद्रचूड़ ने यह उठाया कि यदि किसी सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से पहले विधानसभा या लोकसभा भंग हो जाती है, तो भारतीय कानूनों के अनुसार उप-चुनाव कराए जा सकते हैं। इससे मतदाताओं का प्रतिनिधित्व बना रहता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्ताव सिर्फ तभी संविधान की ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ का उल्लंघन करेगा, यदि यह साबित हो कि अलग-अलग समय पर चुनाव कराना संविधान की मूल भावना का हिस्सा है।
विश्वास मत और अल्पमत सरकार का मुद्दा
पूर्व CJI ने प्रस्तावित कानून के उस प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है जिसमें अविश्वास प्रस्ताव लाने पर समय सीमा तय करने की बात कही गई है। उन्होंने इसे संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ बताया। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व सीजेआई ने कहा, “संसदीय लोकतंत्र का मुख्य सिद्धांत यह है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद को हमेशा सदन का समर्थन प्राप्त होना चाहिए। अगर अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए समय सीमा तय की जाती है तो यह सिद्धांत कमजोर पड़ जाएगा।” उन्होंने कहा, “अगर अविश्वास प्रस्ताव लाने की अनुमति सिर्फ विश्वास मत के बाद ही दी जाती है, तो अल्पमत वाली सरकारें भी सत्ता में बनी रह सकती हैं, जो लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।”
संविधान में संशोधन का प्रस्ताव
इस विधेयक के तहत संविधान में नया अनुच्छेद 82(A) जोड़ा जाएगा, जिससे लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के एकसाथ चुनाव की व्यवस्था की जा सकेगी। इसके साथ ही अनुच्छेद 83, 172 और 327 में संशोधन प्रस्तावित है। विधेयक के अनुसार, यह संशोधन 2029 के आम चुनावों के बाद प्रभावी होगा और देश में पहली बार एकसाथ चुनाव 2034 में होंगे। इसके लिए राष्ट्रपति “नियुक्त तिथि” की घोषणा करेंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी होंगे शामिल
11 जुलाई को प्रस्तावित बैठक में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली और पूर्व सांसद ईएमएस नचियप्पन भी अपनी राय साझा करेंगे। सूत्र ने बताया कि संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संसद की संयुक्त समिति की अगली बैठक 11 जुलाई को निर्धारित की गई है, जब समिति के सदस्य दोनों सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीशों के साथ बातचीत करेंगे। इसके अलावा, वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य ई एम सुदर्शन नचियप्पन, जो कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर स्थायी समिति के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री तथा कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एम वीरप्पा मोइली भी समिति के समक्ष उपस्थित होंगे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि स्वतंत्र भारत में 1952 से 1967 तक एकसाथ चुनाव होते रहे, लेकिन बाद में संसद या विधानसभा भंग होने की घटनाओं के चलते चुनाव चक्र टूट गया। बीते वर्षों में नीति आयोग, चुनाव आयोग और संसद की अन्य समितियों ने इस मुद्दे का अध्ययन किया है और इसे व्यावहारिक बनाना संभव बताया है, हालांकि इसके लिए भारी लॉजिस्टिक तैयारी की आवश्यकता होगी।
