March 9, 2026

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने किया ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का समर्थन… पर EC के अधिकारों पर जताई चिंता

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नई दिल्ली। भारत (India) के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (Former Chief Justices) ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ (‘One Nation, One Election’) की अवधारणा को संवैधानिक रूप से वैध माना है, लेकिन उन्होंने संसद की संयुक्त समिति को सौंपी गई अपनी राय में इस विधेयक के कुछ पहलुओं, विशेष रूप से चुनाव आयोग (Election Commission) को दिए गए व्यापक अधिकारों पर चिंता जताई है। भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) रह चुके न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ (Justice DY Chandrachud) ने संयुक्त संसदीय समिति को सौंपी अपनी राय में विपक्ष की इस आलोचना को खारिज कर दिया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव का एक साथ होना संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि संविधान में कहीं भी राष्ट्रीय और राज्य चुनावों को अलग-अलग कराने की बात नहीं कही गई है।

निर्वाचन आयोग की शक्तियों पर सवाल
हालांकि, संसदीय समिति को सौंपी गई राय के अनुसार, प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन कानून में निर्वाचन आयोग को ‘विवेक के प्रयोग के लिए कोई दिशानिर्देश निर्धारित किए बिना’ दी गई ‘व्यापक शक्तियों’ पर सवाल उठाने में वह एक अन्य पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के साथ शामिल हो गए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और एक अन्य पूर्व सीजेआई जे एस खेहर 11 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद पी पी चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष पेश होने वाले हैं ताकि सदस्य उनसे विधेयक के प्रावधानों पर बातचीत कर सकें और अपने प्रश्नों पर उनके विचार जान सकें।

विधेयक में चुनाव आयोग को दी जाने वाली व्यापक शक्तियों पर सवाल उठाते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘असीमित अधिकार’ चुनाव निकाय को राज्य विधानसभा के कार्यकाल की संवैधानिक रूप से अनिवार्य पांच साल की अवधि को कम करने या बढ़ाने में सक्षम बना सकता है, खासकर इस बहाने कि लोकसभा के साथ एक साथ चुनाव व्यवहार्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि संविधान को उन परिस्थितियों को परिभाषित, चित्रित और संरचित करना चाहिए जिनके तहत ईसीआई इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है।

“साथ नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से चुनाव कराए”
दो पूर्व सीजेआई, न्यायमूर्ति यू यू ललित और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई क्रमशः फरवरी और मार्च में समिति के समक्ष पेश हुए थे। सूत्रों ने कहा है कि बातचीत के दौरान न्यायमूर्ति गोगोई ने बताया कि आयोग को दी गई अत्यधिक शक्ति के संबंध में कुछ सदस्यों की चिंता से वह सहमत हैं। न्यायमूर्ति ललित ने सुझाव दिया था कि एक साथ चुनाव एक साथ नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से कराए जाने चाहिए, क्योंकि उन्होंने कहा था कि चुनाव चक्रों को समकालिक बनाने के उद्देश्य से बची हुई विधानसभाओं के कार्यकाल को काफी छोटा करने को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।

हालांकि, तीनों पूर्व प्रधान न्यायाधीशों ने एक साथ चुनाव की अवधारणा की संवैधानिकता पर सवाल नहीं उठाया है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी लिखित राय में कहा कि एक साथ चुनाव कराने से प्रतिनिधियों को चुनने के मतदाताओं के अधिकार का हनन नहीं होगा और यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि मतदाताओं का प्रतिनिधित्व उनके विधिवत निर्वाचित सांसदों या विधायकों द्वारा निरंतर किया जाता रहे। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने का विरोध करने वाले तर्क इस आधार पर आधारित हैं कि भारतीय मतदाता भोले-भाले हैं और उन्हें आसानी से बहकाया जा सकता है।

मूल ढांचे पर क्या बोले चंद्रचूड़?
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘यह तर्क कि क्रमिक चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं (या संघवाद या लोकतंत्र के सिद्धांतों का हिस्सा हैं) सही नहीं है। चुनावों के क्रमिक समय को मूल संविधान की विशेषता नहीं माना जा सकता, इसे अपरिवर्तनीय विशेषता मानना तो दूर की बात है।’’ हालांकि, उनकी राय विधेयक की कुछ विशेषताओं को लेकर या इसे लागू किए जाने पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के बारे में सावधानी बरतने से रहित नहीं हैं।

सभी पार्टियों को मिले समान अवसर
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस बात पर चिंता जताई कि एक साथ चुनाव कराने से बेहतर संसाधन वाली राष्ट्रीय पार्टियों के प्रभुत्व के कारण छोटी या क्षेत्रीय पार्टियां हाशिए पर चली जाएंगी। उन्होंने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहलू है जिस पर विधायी रूप से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘‘राजनीतिक दलों के बीच समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए, चुनावी प्रचार को नियंत्रित करने वाले नियमों विशेष रूप से चुनाव प्रचार पर खर्च से संबंधित नियमों को मजबूत किया जाना चाहिए।’’

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव संचालन नियम, 1961, चुनाव प्रचार के दौरान उम्मीदवार द्वारा खर्च की जाने वाली राशि पर अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन खुद राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले व्यय पर इस तरह की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने कहा कि विनियमन में यह अंतर चुनावी प्रक्रिया में अधिक वित्तीय संसाधनों वाले दलों के पक्ष में जाता है।

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