March 8, 2026

BMC चुनाव 2026: मुंबई में 'बिहारी बाबू' का जलवा, उद्धव-राज ठाकरे का मराठी कार्ड फेल, बीजेपी गठबंधन की ऐतिहासिक वापसी

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मुंबई । देश की सबसे अमीर नगर पालिका, बृहन्मुंबई नगर निगम BMC के 2026 के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है। करीब तीन दशक बाद बीएमसी की सत्ता से शिवसेना का एकछत्र राज खत्म हो गया है और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले ‘महायुति’ गठबंधन ने पूर्ण बहुमत के साथ जीत दर्ज की है। लेकिन इस चुनाव की सबसे बड़ी सुर्खी ‘मराठी मानुष’ बनाम ‘उत्तर भारतीय’ के एजेंडे का ध्वस्त होना रही। मुंबई के मतदाताओं ने क्षेत्रवाद को दरकिनार कर बिहार मूल के छह उम्मीदवारों को भारी मतों से जिताकर निगम भेजा है।

मिथिलांचल के वीरों ने फहराया परचम इस चुनाव में विशेष रूप से बिहार के मधुबनी जिले और मिथिलांचल क्षेत्र का दबदबा देखने को मिला। मधुबनी के झंझारपुर तालुका से ताल्लुक रखने वाले छह नेताओं ने मुंबई की राजनीति में अपनी धाक जमाई है शिवकुमार झा BJP .कांदिवली ईस्ट वार्ड 23 से लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर हैट्रिक बनाई। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को करीब 5,400 वोटों के बड़े अंतर से हराया। विनोद मिश्रा BJP मलाड वार्ड 43 से एक बड़ी जीत हासिल की। राजेश झा शिवसेना – शिंदे गोरेगांव वार्ड 163 से विजयी रहे। संतोष कुमार मंडल व उमेश राय BJP कांदिवली के वार्ड 160 और 161 से जीत दर्ज की। धीरेंद्र मिश्रा: कुर्ला-चांदीवली वार्ड 174 से कड़े मुकाबले में जीत हासिल की।

ठकरे परिवार का ‘मराठी मानुष’ एजेंडा हुआ विफल लंबे समय से मुंबई की राजनीति उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के इर्द-गिर्द ‘मराठी मानुष’ के मुद्दे पर सिमटी रही है। हालांकि, 2026 के इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि खुद मराठी मतदाताओं ने भी इस संकीर्ण एजेंडे के बजाय विकास और समावेशी राजनीति को चुना है। कांदिवली, मलाड, गोरेगांव और कुर्ला जैसे क्षेत्रों में उत्तर भारतीय वोटरों ने निर्णायक भूमिका निभाई, जिससे उद्धव ठाकरे की शिवसेना को तगड़ा झटका लगा है।

सत्ता का नया समीकरण 227 सीटों वाली बीएमसी में बहुमत के लिए 114 सीटों की आवश्यकता थी, जिसे बीजेपी-शिंदे गठबंधन ने आसानी से पार कर लिया। बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। 19 सालों से बीएमसी पर काबिज शिवसेना को इस बार विपक्ष में बैठना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रवासियों के प्रति नफरत की राजनीति अब मुंबई में काम नहीं कर रही है, और उत्तर भारतीय उम्मीदवार अब केवल ‘वोट बैंक’ नहीं बल्कि ‘निर्णायक नेतृत्व’ के रूप में उभर रहे हैं।

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