भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम समझौते पर छिड़ी क्रेडिट की लड़ाई, कांग्रेस बोली- इतिहास जानिए, फिर उपलब्धि का दावा कीजिए
भाजपा का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक साख लगातार मजबूत हुई है, जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया जैसे महत्वपूर्ण साझेदार देश के साथ रणनीतिक संबंध नई ऊंचाइयों तक पहुंचे हैं। पार्टी का दावा है कि वर्तमान नेतृत्व में भारत को वैश्विक मंच पर एक भरोसेमंद और जिम्मेदार रणनीतिक साझेदार के रूप में स्वीकार किया गया है, जिससे यूरेनियम सहयोग जैसे महत्वपूर्ण समझौते संभव हो सके हैं।
वहीं कांग्रेस ने भाजपा के इन दावों का विरोध करते हुए कहा है कि भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आपूर्ति का रास्ता कई वर्ष पहले ही खुल चुका था। पार्टी का तर्क है कि इस दिशा में प्रारंभिक और महत्वपूर्ण निर्णय पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में लिए गए थे। कांग्रेस का कहना है कि उस समय दोनों देशों के बीच विश्वास निर्माण और कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम बिक्री की नीति में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की थी।
कांग्रेस ने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वीकार्यता बढ़ी और उसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया ने भारत के प्रति अपनी नीति में परिवर्तन किया। पार्टी नेताओं का कहना है कि वर्तमान सरकार को पूरे घटनाक्रम के ऐतिहासिक संदर्भ को समझे बिना केवल राजनीतिक लाभ के लिए पूरे श्रेय का दावा नहीं करना चाहिए। कांग्रेस ने भाजपा के नेताओं से तथ्यों का अध्ययन करने और ऐतिहासिक घटनाक्रम को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की सलाह भी दी है।
दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को अंतिम रूप तक पहुंचाने में वर्तमान सरकार की सक्रिय कूटनीति, रणनीतिक दृष्टिकोण और वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पार्टी का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में तेजी से मजबूत हुए हैं, जिसका लाभ परमाणु ऊर्जा सहयोग में भी दिखाई दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति और रणनीतिक समझौतों को लेकर श्रेय की राजनीति नई नहीं है। अक्सर अलग-अलग सरकारें अपने कार्यकाल में हुई प्रगति को प्रमुख उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जबकि ऐसे समझौते कई वर्षों तक चलने वाली कूटनीतिक प्रक्रिया का परिणाम होते हैं। इसलिए किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते के पीछे विभिन्न चरणों में किए गए प्रयासों और निरंतर संवाद की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंध भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों, रक्षा सहयोग और आर्थिक साझेदारी को नई दिशा दे सकते हैं। हालांकि यूरेनियम सहयोग को लेकर शुरू हुई यह राजनीतिक बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय हित से जुड़े ऐसे विषयों पर दीर्घकालिक कूटनीतिक प्रयासों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
