अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर
अमिताभ कांत के अनुसार, क्लीन टेक्नोलॉजी के लगभग सभी प्रमुख वर्टिकल्स में चीन का दबदबा है. दुनिया की करीब 95% क्लीन बैटरियां और 85% इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) चीन में बनते हैं. इसके अलावा, क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग तकनीक के साथ-साथ सोलर सेक्टर पर करीब 80% और विंड एनर्जी में 77% नियंत्रण चीन का ही है.
दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के बाजार में अमेरिका का बड़ा प्रभाव है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का आयात करता है, जिस पर सालाना लगभग 180 अरब डॉलर का खर्च आता है. पश्चिम एशिया में तनाव या युद्ध की स्थिति बनते ही कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, जिससे भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिरता और पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है.
देश हित में चीन के साथ काम करना क्यों है जरूरी?
‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को भविष्य में तेजी से क्लीन टेक्नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ना होगा. ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित में चीन के साथ तकनीकी स्तर पर सहभागिता बनाना जरूरी है, लेकिन चीन को इस तकनीक को ‘वेपनाइज’ बनाने से रोकना होगा. चीन को यह तकनीक BRICS देशों और ग्लोबल साउथ के साथ साझा करनी चाहिए.
चीन के नॉन-टैरिफ बैरियर्स और बाजार की असमानता
चीन की नीति मुख्य रूप से निर्यात पर केंद्रित है, जबकि वह दूसरे देशों के आयात के लिए अपना बाजार आसानी से नहीं खोलता. चीन में मौजूद नॉन-टैरिफ बैरियर्स के कारण भारत के फार्मास्यूटिकल और ड्रग मैन्युफैक्चरर्स वहां आसानी से प्रवेश नहीं कर पाते. आगामी BRICS शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत को चीन के सामने अपने बाजारों को खोलने और क्लीन टेक साझा करने का मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए.
अमिताभ कांत ने कहा कि क्लीन टेक्नोलॉजी में किसी एक देश का अत्यधिक नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ग्लोबल साउथ के देशों के सतत विकास के लिए तकनीक, निवेश और बाजारों का आपस में साझा होना जरूरी है, ताकि एकाधिकार की स्थिति से बचा जा सके.
भारत की आर्थिक वृद्धि पर बात करते हुए उन्होंने एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत में नई औद्योगिक क्रांति की बात कही गई है. इसके पीछे स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और एयरोस्पेस जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स की मुख्य भूमिका है.
भारत में औद्योगिक वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सरकार ने उन क्षेत्रों को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खोल दिया है, जिन पर पहले सरकारी नियंत्रण था. जियो-स्पेशियल, ड्रोन, स्पेस और डिफेंस सेक्टर्स में निजी भागीदारी और स्टार्टअप्स के आने से नई तकनीक, निवेश और प्रतिस्पर्धा को बड़ा प्रोत्साहन मिला है.
डिजाइनिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर भारत का फोकस
भारत अब केवल तकनीक और चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी बढ़ा रहा है. सेमीकंडक्टर PLI योजना की सफलता और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में आई तेजी इसका प्रमाण हैं. भारत का लक्ष्य घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ ग्लोबल सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनना है.
BRICS देश दुनिया की कुल GDP का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं. अमिताभ कांत ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी अध्यक्षता के दौरान संगठन का ध्यान राजनीतिक ध्रुवीकरण या ‘पश्चिम-विरोधी’ रुख पर ले जाने के बजाय व्यापार, निवेश, जलवायु और विकास जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए.
पश्चिम एशिया के तनाव और विभिन्न सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच भारत को ‘कंसेंसस बिल्डिंग’ की भूमिका निभानी होगी. जैसा कि भारत ने G20 सम्मेलन में संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाकर दिखाया था, वैसा ही नेतृत्व BRICS में भी दिखाकर सभी देशों को एक न्यूनतम साझा एजेंडे पर साथ लाना होगा.
