July 12, 2026

होर्मुज संकट की वापसी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की सलाह

0
14-1783845747
नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तेज हुए सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर आवाजाही प्रभावित किए जाने के बाद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक पर संकट गहरा गया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है और तेल तथा गैस की वैश्विक आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इस स्थिति का असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों, विशेषकर भारत, पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वहन करता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है, जिससे पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी आवश्यक ईंधन वस्तुओं की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस स्थिति को भारत के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी बताया है। उनका कहना है कि देश को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का तेजी से विस्तार करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक आपूर्ति संकट का प्रभाव सीमित किया जा सके। उनके अनुसार सीमित आपूर्ति मार्गों और कम आपातकालीन भंडार पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करती है।

उन्होंने कहा कि पिछले होर्मुज संकट ने यह स्पष्ट कर दिया था कि केवल एक या दो आपूर्ति मार्गों पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। भारत को विभिन्न देशों से ऊर्जा आयात बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू भंडारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी। वर्तमान में देश के रणनीतिक कच्चे तेल भंडार की क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जिसे विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर स्थित भंडारण केंद्रों में सुरक्षित रखा जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछली बार उत्पन्न संकट के दौरान भारत ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीतियों के कारण स्थिति को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संभाला था। ऊर्जा आयात के विविधीकरण, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और आपूर्ति श्रृंखला को लचीला बनाने जैसे कदमों ने संभावित संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया। यही अनुभव भविष्य की रणनीति तैयार करने में भी उपयोगी माना जा रहा है।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार केवल तेल ही नहीं, बल्कि हर महत्वपूर्ण संसाधन के लिए आपूर्ति के अनेक स्रोत विकसित करना समय की आवश्यकता है। किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता भू-राजनीतिक तनाव के समय आर्थिक जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता रणनीतिक भंडार का विस्तार और आयात स्रोतों का व्यापक विविधीकरण माना जा रहा है।

इस बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए समय रहते ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े दीर्घकालिक निवेश और रणनीतिक तैयारी को प्राथमिकता देना आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *