October 20, 2026

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर

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नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं और वित्तीय जोखिमों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने मंगलवार को कहा कि भारत का अनुभव बताता है कि मजबूत व्यापक आर्थिक आधार किसी देश को चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी स्थिरता और निरंतर विकास बनाए रखने में मदद कर सकता है। उन्होंने यह बात भारतीय रिजर्व बैंक के अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘संवाद 2026’ के दूसरे दिन वित्तीय स्थिरता पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कही।

अनुराधा ठाकुर के अनुसार, भारत की राजकोषीय स्थिति विश्वसनीय रही है। इसके साथ ही, मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखने की लचीली व्यवस्था ने महंगाई को लेकर लोगों और बाजारों की अपेक्षाओं को स्थिर बनाए रखने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत मौजूदा चुनौतीपूर्ण वैश्विक हालात का सामना व्यापक आर्थिक स्थिरता की मजबूत स्थिति के साथ कर रहा है। उनके संबोधन में आर्थिक आधार को मजबूत बनाए रखने और बदलते वैश्विक वातावरण में स्थिरता कायम रखने के महत्व पर जोर दिया गया।

संगोष्ठी में आयोजित पैनल चर्चा के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने वित्तीय स्थिरता को एक स्वतंत्र नीतिगत उद्देश्य के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी नीतियों का दायरा अब केवल अलग-अलग संस्थानों की स्थिति तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बजाय पूरी वित्तीय प्रणाली की मजबूती पर ध्यान दिया जा रहा है। इस व्यापक दृष्टिकोण में बैंकों के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की भूमिका और उनसे जुड़े जोखिमों को भी शामिल किया गया है।

चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने आगाह किया कि वित्तीय संकट अब पहले की तुलना में अधिक तेजी से सामने आ सकते हैं और उनकी गंभीरता भी बढ़ सकती है। ऐसे में वित्तीय प्रणाली की निगरानी, जोखिमों की समय रहते पहचान और संस्थानों की संकट से निपटने की क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। पैनल के सदस्यों ने यह भी कहा कि वित्तीय क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देते समय पिछली आर्थिक मंदियों और संकटों से मिली सीख को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वित्तीय पुनर्गठन से पैदा होने वाले संभावित दुष्प्रभावों का आकलन भी नीतिगत फैसलों का हिस्सा होना चाहिए।

वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन के जोखिम, गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थों का बढ़ता प्रभाव, फिनटेक कंपनियों की भूमिका और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन कारकों को वित्तीय नीतियों और जोखिम आकलन में उचित महत्व देना आवश्यक है। इसके अलावा, वित्तीय आंकड़ों को साझा करने में मौजूद कमियों को दूर करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एजेंटों के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

पैनल ने वित्तीय सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने पर जोर देते हुए कहा कि केवल बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों और परिवारों की वित्तीय स्थिति भी ऐसी होनी चाहिए कि वे अचानक पैदा होने वाले आर्थिक झटकों का सामना कर सकें। इस दृष्टिकोण के तहत पूरी वित्तीय व्यवस्था की मजबूती और विभिन्न क्षेत्रों के बीच जोखिमों के प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण माना गया।चर्चा में भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष अजय सेठ, भूटान की रॉयल मॉनेटरी अथॉरिटी की गवर्नर यांगचेन त्शोग्येल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अथानासियोस वाम्वाकिडिस और इनवेस्को के पॉल जैक्सन भी शामिल हुए।

दो दिवसीय ‘संवाद 2026’ का उद्घाटन सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने किया था। इस अवसर पर केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुख्य संबोधन दिया। आयोजन में विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों के गवर्नर, वरिष्ठ नीति निर्माता, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ वैश्विक वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद चुनौतियों तथा संभावित अवसरों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

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