लिथियम कोबाल्ट और निकेल की बढ़ेगी रिकॉर्ड मांग विकसित भारत के लक्ष्य में क्रिटिकल मिनरल निभाएंगे सबसे अहम भूमिका
रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए भी तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। यही कारण है कि बैटरियों और ऊर्जा भंडारण प्रणाली में इस्तेमाल होने वाले खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि केवल इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों की मांग ही वर्ष 2030 तक 110 से 130 गीगावाट तक पहुंच सकती है जिससे इन खनिजों का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत को केवल खनिजों के आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू स्तर पर अन्वेषण रिफाइनिंग प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी। यदि देश समय रहते इन क्षेत्रों में निवेश करता है तो भविष्य में वैश्विक आपूर्ति संकट और आयात पर बढ़ती निर्भरता से बचा जा सकता है। इसके साथ ही घरेलू उद्योगों को भी नई गति मिलेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
विशेषज्ञों ने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तीन चरणों वाला रोडमैप भी सुझाया है। पहले चरण में वर्ष 2026 से 2031 के बीच बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसमें एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी लागू करना सर्कुलर मिनरल प्रोसेसिंग जोन विकसित करना और बैटरी ट्रेसबिलिटी तथा रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करना शामिल है। दूसरे चरण में वर्ष 2031 से 2036 के बीच रीसाइक्लिंग नेटवर्क का विस्तार और ग्रीन फाइनेंसिंग के जरिए औद्योगिक विकास को गति देने की योजना प्रस्तावित की गई है।
तीसरे और अंतिम चरण में वर्ष 2036 से 2047 तक भारत को रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने आयात पर निर्भरता कम करने और 10 से 15 अरब डॉलर की वार्षिक रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इससे भारत वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नीतियों का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं बल्कि संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसके लिए खनिज आधारित रणनीतियों को अपनाने घरेलू वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने और मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने और निजी निवेश आकर्षित करने पर भी जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रिफाइनिंग सेपरेशन और रीसाइक्लिंग जैसे क्षेत्र अत्यधिक पूंजी निवेश वाले हैं और इनमें निवेश का लाभ लंबे समय बाद मिलता है। इसलिए सरकारी सहायता ग्रीन बॉन्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वेंचर कैपिटल और बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों के सहयोग जैसी बहुस्तरीय वित्तीय व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के लिए किए गए वित्तीय प्रावधान को सकारात्मक कदम बताते हुए रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए और अधिक लक्षित वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि भारत भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को आत्मनिर्भर तरीके से पूरा कर सके।
