पांच रुपये वाले चिप्स और नमकीन पैकेट पर संकट, तीन साल में आधे से भी कम हुआ वजन, कंपनियां बदल रहीं रणनीति
नई दिल्ली ।देश में चिप्स, वेफर्स और नमकीन खरीदने वाले ग्राहकों के लिए आने वाले समय में पांच रुपये का छोटा पैकेट मिलना मुश्किल हो सकता है। कभी स्नैक्स कंपनियों की बिक्री और कमाई का बड़ा आधार रहे ये पैकेट अब कारोबार के लिहाज से कम आकर्षक होते जा रहे हैं। आलू, खाद्य तेल और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ा दिया है। लागत घटाने के लिए कंपनियां पहले ही पैकेट में मिलने वाली मात्रा कम कर चुकी हैं, लेकिन अब वजन में और कटौती करना भी आसान नहीं रह गया है। ऐसे में कंपनियां ग्राहकों को 10 और 20 रुपये के बड़े पैकेट खरीदने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
पिछले तीन से चार वर्षों में पांच रुपये वाले चिप्स और वेफर्स पैकेट का वजन काफी घटा है। लेज और यलो डायमंड जैसे ब्रांडों के पांच रुपये वाले पैकेट पहले जहां 25 से 30 ग्राम तक के होते थे, वहीं अब इनका वजन घटकर करीब 11 से 14 ग्राम रह गया है। यानी कुछ उत्पादों में ग्राहकों को पहले के मुकाबले आधे से भी कम मात्रा मिल रही है। कंपनियों ने कीमत पांच रुपये पर बनाए रखकर पैकेट का वजन घटाया, ताकि कम कीमत वाले उत्पादों की बिक्री जारी रहे। हालांकि, अब मात्रा और कम करने पर ग्राहकों की नाराजगी का खतरा बढ़ सकता है।
छोटे पैकेट कंपनियों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनकी मांग ग्रामीण और छोटे शहरों के बाजारों में काफी ज्यादा है। बिस्किट और स्नैक्स कंपनियों की कुल बिक्री में पांच और दस रुपये वाले पैकेट की हिस्सेदारी करीब 60 से 65 प्रतिशत बताई जाती है। बालाजी वेफर्स के सालाना राजस्व में इन छोटे पैकेटों का योगदान लगभग 65 प्रतिशत है। पारले प्रोडक्ट्स की करीब 75 प्रतिशत कमाई वैल्यू सेगमेंट से आती है। वहीं, गुजरात की गोपाल स्नैक्स को भी लगभग 60 प्रतिशत राजस्व पांच रुपये वाले वेफर्स पैकेट से मिलता है। इससे स्पष्ट है कि कम कीमत वाले उत्पाद कंपनियों के कारोबार का अहम हिस्सा हैं।
इसके बावजूद पांच रुपये का पैकेट बनाना कंपनियों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। एक पैकेट की बिक्री से मिलने वाले पांच रुपये में से करीब एक रुपया टैक्स और वितरक के मार्जिन में चला जाता है। लगभग तीन रुपये कच्चे माल, खाद्य तेल और पैकेजिंग पर खर्च होते हैं। इसके बाद परिवहन और फैक्ट्री संचालन जैसी लागत निकालने पर कंपनियों के पास करीब 15 से 20 पैसे ही बचते हैं। इतने कम मार्जिन में कारोबार चलाना और बढ़ती लागत का सामना करना कंपनियों के लिए चुनौती बन गया है।
पिछले छह महीनों में कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी ने स्थिति और कठिन कर दी है। उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में पैदावार कम होने के कारण कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू की कीमतें 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। चिप्स और वेफर्स बनाने में आलू प्रमुख कच्चा माल है, इसलिए इसकी महंगाई का सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है। दूसरी ओर, आयात शुल्क में बढ़ोतरी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें चढ़ने के कारण खाद्य तेल भी 25 से 35 प्रतिशत तक महंगा हुआ है।
पैकेजिंग का खर्च भी कंपनियों की परेशानी बढ़ा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर प्लास्टिक फिल्म पर पड़ा है। स्नैक्स के रैपर बनाने में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक फिल्म की कीमत हाल के हफ्तों में करीब 20 प्रतिशत बढ़ी है। एक साल पहले की तुलना में इसकी लागत में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है। ऐसे में कंपनियों के लिए पांच रुपये के पैकेट की कीमत और मात्रा दोनों को संतुलित रखना मुश्किल हो रहा है।
अब कंपनियां बिक्री की रणनीति में बदलाव कर रही हैं। बालाजी वेफर्स और क्रैक्स बनाने वाली डीएफएम फूड्स ने पिछले कुछ महीनों में पांच रुपये वाले पैकेट पर खुदरा विक्रेताओं का मार्जिन करीब 10 प्रतिशत घटाया है। इसके उलट, 10 और 20 रुपये के पैकेट पर बेहतर मार्जिन दिया जा रहा है, ताकि दुकानदार भी ग्राहकों को बड़े पैकेट खरीदने के लिए प्रेरित करें।
कुछ कंपनियां पैकेट की कीमत और उत्पाद की मात्रा में बदलाव किए बिना पैकेजिंग खर्च कम करने की कोशिश कर रही हैं। प्रताप स्नैक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित कुमत के मुताबिक, कंपनी पैकेट की सीलिंग वाली जगह 12 मिलीमीटर से घटाकर 8 मिलीमीटर कर रही है। इसी तरह 200 मिलीमीटर के पैकेट को 190 मिलीमीटर किया जा रहा है। इस बदलाव से पैकेजिंग लागत का असर करीब 10 प्रतिशत तक कम करने की कोशिश है।
इसके साथ ही कंपनियां प्रीमियम स्नैक्स की बिक्री बढ़ाने पर भी ध्यान दे रही हैं। कोरियन बीबीक्यू और चिली लेमन जैसे नए फ्लेवर, हेल्दी विकल्प और बड़े पैकेट बाजार में उतारे जा रहे हैं। गोपाल स्नैक्स ने पाम ऑयल फ्री उत्पाद, 300 रुपये प्रति किलो कीमत वाले प्रीमियम नमकीन और 190 ग्राम के जिपर पैकेट लॉन्च किए हैं। कंपनी को उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। इस तरह बढ़ती लागत के बीच स्नैक्स कंपनियां छोटे पैकेटों पर निर्भरता घटाकर बड़े और प्रीमियम उत्पादों की ओर कारोबार का रुख मोड़ रही हैं।
