November 1, 2026

दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ क्यों होती है गणेश जी की पूजा, जानिए धन-संपत्ति और बुद्धि से जुड़ी पौराणिक मान्यता

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नई दिल्ली ।दिवाली हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। साल 2026 में दिवाली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन घरों और दुकानों को दीपों से सजाया जाता है और सुख-समृद्धि की कामना के साथ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दिवाली के अवसर पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दोनों देवी-देवताओं की एक साथ आराधना करने के पीछे विशेष महत्व और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। वहीं, भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और शुभ कार्यों के आरंभ के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि जीवन में केवल धन का होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सही इस्तेमाल करने के लिए समझदारी और विवेक भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त धन हो, लेकिन उसे सही तरीके से खर्च करने और संभालने की बुद्धि न हो तो वह संपत्ति उसके लिए लाभकारी नहीं रह सकती। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए दिवाली पर लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की पूजा की जाती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी की आराधना से धन-संपत्ति और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, जबकि भगवान गणेश की पूजा से बुद्धि, विवेक और जीवन की बाधाओं से मुक्ति का आशीर्वाद मांगा जाता है। दोनों की संयुक्त पूजा का संदेश है कि व्यक्ति के जीवन में आर्थिक संपन्नता के साथ सही निर्णय लेने की क्षमता भी होनी चाहिए। धन और सद्बुद्धि का संतुलन ही सुखी एवं समृद्ध जीवन का आधार माना जाता है।

मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की एक साथ पूजा करने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी को अपने धन और वैभव पर अभिमान हो गया था। तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि संसार में भले ही हर कोई उनकी कृपा प्राप्त करना चाहता हो, लेकिन मातृत्व के बिना उनका जीवन अधूरा है। भगवान विष्णु की यह बात सुनकर मां लक्ष्मी दुखी हो गईं।

मां लक्ष्मी को उदास देखकर माता पार्वती ने अपने पुत्र भगवान गणेश को उनकी गोद में बैठा दिया। इससे लक्ष्मीजी बेहद प्रसन्न हुईं और उन्होंने गणेशजी को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने वरदान दिया कि जो भी भक्त उनकी पूजा करेगा, उसे भगवान गणेश की आराधना भी करनी होगी। तभी उसे दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होगा। इसी पौराणिक मान्यता को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की संयुक्त पूजा की एक प्रमुख वजह माना जाता है।

भगवान गणेश से जुड़ी रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ की मान्यताएं भी इस परंपरा को विशेष बनाती हैं। धार्मिक कथाओं में रिद्धि और सिद्धि को गणेशजी की पत्नियां बताया गया है। रिद्धि को समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है, जबकि सिद्धि सफलता और उपलब्धियों से जुड़ी हैं। वहीं, शुभ और लाभ को रिद्धि-सिद्धि का पुत्र माना जाता है। शुभ का अर्थ मंगल और कल्याण से है, जबकि लाभ उन्नति और तरक्की का प्रतीक है।

इसी कारण दिवाली के अवसर पर कई लोग अपने घरों, दुकानों और पूजा स्थलों के प्रवेश द्वार पर शुभ-लाभ लिखते हैं। धार्मिक विश्वास है कि इससे घर में सकारात्मकता, सुख और समृद्धि बनी रहती है। इस तरह दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा केवल धन प्राप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में संपन्नता के साथ बुद्धि, विवेक, सफलता और मंगल की कामना का भी प्रतीक मानी जाती है।

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