September 7, 2026

लहसुन-प्याज के फायदे के बावजूद जैन समाज क्यों नहीं करता सेवन? वायरल वीडियो में मुनि के जवाब पर बजीं तालियां

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नई दिल्ली । लहसुन और प्याज भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सब्जियों में शामिल हैं। इनके सेवन को सामान्य तौर पर स्वाद और पोषण से जोड़ा जाता है। हालांकि जैन समाज में प्याज, लहसुन, आलू और जमीन के भीतर उगने वाली कई अन्य कंद-मूल सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता। इसके पीछे केवल खानपान से जुड़े कारण नहीं, बल्कि जैन धर्म की धार्मिक मान्यताएं और अहिंसा का सिद्धांत महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी विषय को लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से चर्चा में है। वीडियो में ‘भाभी जी घर पर है’ के कलाकार सानंद वर्मा, मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज से जैन समाज में प्याज और लहसुन के सेवन से परहेज किए जाने की वजह पूछते नजर आते हैं। मुनि ने सवाल का जवाब देते हुए भोजन और जैन जीवनशैली से जुड़ी मान्यताओं को समझाया।

वीडियो में सानंद वर्मा पहले मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज का आशीर्वाद लेते हैं और फिर उनसे पूछते हैं कि जैन समाज के लोग प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते। इसके जवाब में महाराज उनसे सवाल करते हैं कि उन्हें किस समाज के लोगों की बुद्धि सबसे तेज लगती है। बातचीत के दौरान वह मजाकिया अंदाज में बनिया समाज का उल्लेख करते हैं और इसके बाद जमीन के अंदर उगने वाली चीजों को लेकर अपनी बात रखते हैं।

सागरजी महाराज के अनुसार जमीन के अंदर उगने वाले पदार्थ अंधेरे, नमी और मिट्टी के संपर्क में रहते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में जमीन के नीचे उगने वाले फल खाने और जमीन के ऊपर उगने वाले फल खाने के बीच अंतर समझाने की कोशिश की। उनके कथन के अनुसार जमीन के ऊपर उगने वाले पौधों को प्रकाश और ऑक्सीजन मिलती है। इसी बात को उन्होंने जैन समुदाय के खानपान और मानसिक तेज होने की धारणा से जोड़कर बताया।

इसके बाद महाराज ने जमीन के अंदर उगने वाली सब्जियों से परहेज का दूसरा कारण भी बताया। उन्होंने कहा कि जमीन के नीचे मौजूद चीजों को निकालते समय छोटे-छोटे जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। पौधे को जड़ समेत उखाड़कर खाने से कई जीवों के नष्ट होने की आशंका रहती है। उन्होंने इसे अहिंसा के सिद्धांत से जोड़ते हुए भोजन के चयन का कारण बताया।

जैन धर्म में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में आत्मा मानी जाती है और किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुंचाना हिंसा के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से भोजन चुनते समय भी ऐसे विकल्पों को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है, जिनसे जीवों को कम से कम नुकसान पहुंचे।

जैन आहार परंपरा में आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली जैसे कई कंद-मूल को लेकर विशेष नियम माने जाते हैं। इन्हें जमीन से निकालने के लिए पौधे को उखाड़ना पड़ता है, जिससे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंचने की धार्मिक मान्यता है। कुछ कंदों से दोबारा पौधा विकसित होने की क्षमता को भी जैन दर्शन में जीवों की उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है।

वीडियो में सानंद वर्मा महाराज की बात सुनने के बाद कहते हैं कि वह आगे से जमीन के ऊपर उगने वाले फल खाने की कोशिश करेंगे। जैन परंपरा में प्याज और लहसुन का त्याग केवल जमीन के भीतर उगने के कारण नहीं माना जाता, बल्कि संयम और आध्यात्मिक साधना से भी जोड़ा जाता है। भोजन को शरीर की आवश्यकता पूरी करने के साथ मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का माध्यम माना जाता है। जैन साधु-साध्वियों के लिए आहार संबंधी नियम और भी अधिक कठोर होते हैं।

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