September 10, 2026

गुरुवार का व्रत खोलने से पहले जरूर करें ये काम: जानें पूजा की पूरी विधि मंत्र कथा प्रसाद और व्रत के जरूरी नियम

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नई दिल्ली । हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन में सुख शांति समृद्धि ज्ञान और सकारात्मकता की कामना की जाती है। गुरुवार के व्रत को लेकर अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुछ नियम अलग हो सकते हैं इसलिए अपनी कुल परंपरा के अनुसार विधि अपनाना उचित माना जाता है। सामान्य रूप से गुरुवार का व्रत सुबह स्नान और संकल्प के साथ शुरू किया जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु या देवगुरु बृहस्पति की पूजा की जाती है और दिनभर संयम रखते हुए व्रत किया जाता है।

गुरुवार के दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। धार्मिक परंपरा में पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके वहां भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। पूजा की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाया जा सकता है। भगवान को पीले फूल हल्दी अक्षत तुलसी के पत्ते केला और पीले रंग की मिठाई अर्पित करने की परंपरा है। घी का दीपक जलाकर धूप अर्पित करने के बाद भगवान विष्णु का ध्यान किया जाता है। कुछ परंपराओं में केले के पेड़ की पूजा करके उसकी जड़ में जल अर्पित करने का भी विधान बताया गया है।

पूजा के दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु के मंत्र का जाप कर सकते हैं। बृहस्पति देव की आराधना करने वाले ॐ बृहस्पतये नमः मंत्र का जाप भी अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं। इसके बाद गुरुवार व्रत की कथा पढ़ना या सुनना महत्वपूर्ण माना जाता है। पूजा पूरी होने पर भगवान की आरती करें और परिवार के सदस्यों में प्रसाद बांटें। धार्मिक मान्यताओं में व्रत के दौरान गुरु और बुजुर्गों का सम्मान करने तथा उनका आशीर्वाद लेने को भी विशेष महत्व दिया गया है।

गुरुवार के व्रत में भोजन को लेकर भी अलग अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग पूरे दिन फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। कई परंपराओं में गुरुवार को नमक का सेवन न करने की मान्यता भी बताई गई है। ऐसी स्थिति में व्रत रखने वाला व्यक्ति अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियम अपना सकता है। पीले फल केला चने की दाल गुड़ और अन्य सात्विक चीजों का सेवन या प्रसाद के रूप में इस्तेमाल कई जगहों पर किया जाता है।

व्रत के दौरान केवल भोजन का संयम ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता बल्कि व्यवहार में भी संयम रखने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार झूठ बोलना किसी का अपमान करना क्रोध करना या कटु वचन बोलना व्रत की भावना के विपरीत माना जाता है। इसलिए गुरुवार के दिन भगवान की पूजा के साथ अच्छे व्यवहार और सकारात्मक सोच को भी महत्व दिया जाता है। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को चने की दाल पीले वस्त्र केला गुड़ या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना जाता है।

गुरुवार के व्रत की संख्या को लेकर भी अलग अलग परंपराएं हैं। कुछ लोग 11 21 या 51 गुरुवार का संकल्प लेते हैं जबकि कुछ परंपराओं में 16 गुरुवार के व्रत का विधान मिलता है। इसलिए व्रत शुरू करने से पहले अपनी पारिवारिक परंपरा या किसी योग्य आचार्य की सलाह के अनुसार संकल्प लेना बेहतर माना जाता है। संकल्प की निर्धारित संख्या पूरी होने के बाद उद्यापन की परंपरा भी बताई जाती है जिसमें भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा के साथ दान दक्षिणा और प्रसाद वितरण किया जाता है।
गुरुवार के व्रत की संख्या को लेकर भी अलग अलग परंपराएं हैं। कुछ लोग 11 21 या 51 गुरुवार का संकल्प लेते हैं जबकि कुछ परंपराओं में 16 गुरुवार के व्रत का विधान मिलता है। इसलिए व्रत शुरू करने से पहले अपनी पारिवारिक परंपरा या किसी योग्य आचार्य की सलाह के अनुसार संकल्प लेना बेहतर माना जाता है। संकल्प की निर्धारित संख्या पूरी होने के बाद उद्यापन की परंपरा भी बताई जाती है जिसमें भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा के साथ दान दक्षिणा और प्रसाद वितरण किया जाता है।

इस तरह गुरुवार का व्रत केवल उपवास रखने तक सीमित नहीं माना जाता। इसमें सुबह का स्नान संकल्प पूजा मंत्र जाप कथा श्रवण आरती प्रसाद और दान जैसी परंपराएं शामिल हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और नियम के साथ किया गया यह व्रत भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति के प्रति आस्था प्रकट करने का माध्यम है। हालांकि व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान जरूर रखना चाहिए। आस्था के साथ संयम सेवा और अच्छे आचरण को जीवन में अपनाना ही इस धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

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