August 18, 2026

उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया जा रहा घी संक्रांति पर्व : मुख्यमंत्री ने बताया समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की पहचान

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Ghee Sankranti
  • आज घी न खाने वाले को लेकर ये है मान्यता

उत्तराखंड में आज लोकपर्व घी संक्रांति यानी घी त्यार धूमधाम से मनाया जा रहा है। भाद्रपद की पहली तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व खेती, पशुपालन और समृद्धि से जुड़ा है। इसे सिंह संक्रांति और ओल्गिया भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य कर्क राशि से निकलकर सिंह राशि में प्रवेश करता है।

बारिश के बाद खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं और दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है। इसी खुशी में किसान प्रकृति, देवी-देवताओं और पशुधन के प्रति आभार जताते हैं। घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं, बुजुर्ग बच्चों को घी लगाकर आशीर्वाद देते हैं और गांवों में झोड़ा-चांचरी की महफिल सजती है।

घी खाना जरूरी, नहीं तो…
घी संक्रांति से जुड़ी सबसे दिलचस्प लोक मान्यता ‘गनैल’ यानी घोंघा बनने से जुड़ी है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन घी नहीं खाता, वह अगले जन्म में घोंघा बनता है। यह सदियों पुरानी लोकमान्यता है, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

दरअसल, इस मान्यता के पीछे इस पर्व पर घर के बने शुद्ध घी और पौष्टिक भोजन के सेवन की परंपरा को बढ़ावा देने की भावना भी मानी जाती है।

बुजुर्ग बच्चों के सिर पर लगाते हैं घी

घी संक्रांति पर परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों के सिर पर शुद्ध घी या मक्खन लगाते हैं। इसके बाद उन्हें स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रहने का आशीर्वाद दिया जाता है। कई घरों में आज भी यह परंपरा पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

ओल्गिया में फसल की पहली उपज भेंट

इस पर्व का एक नाम ओल्गिया भी है। इस दिन किसान खेतों की पहली उपज के रूप में फल-सब्जियां, दूध-दही और अन्य कृषि उत्पाद अपने कुलदेवता, पंडितों और रिश्तेदारों को भेंट करते हैं। इसे समृद्धि और आपसी प्रेम बांटने की परंपरा माना जाता है।

बेड़ू रोटी से पिनालू के गाबे तक खास पकवान

घी संक्रांति पर उत्तराखंड के घरों में पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू बिखरती है। उड़द की दाल वाली बेड़ू रोटी, पूड़ी, पुए और खीर खास तौर पर बनाए जाते हैं। इसी दिन से पिनालू यानी अरबी के कोमल पत्तों ‘गाबे’ की सब्जी बनाने की शुरुआत की परंपरा भी है।

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को दी शुभकामनाएं

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवभूमि उत्तराखंड के पावन लोकपर्व घी संक्रांति (घ्यू/ओल्गिया त्यार) पर प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं और पर्व प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं।

सीएम ने कहा कि ये पर्व लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने के साथ ही अमूल्य परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का काम करते हैं। उन्होंने ईष्ट देवी-देवताओं से प्रार्थना की कि घी संक्रांति का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए और हर परिवार में खुशहाली बनी रहे।

गांवों में झोड़ा-चांचरी से सजी महफिल

पर्व के मौके पर पहाड़ के गांवों और मंदिरों में सामूहिक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे हैं। पुरुष और महिलाएं पारंपरिक झोड़ा नृत्य करते हैं, जबकि चांचरी के लोकगीतों पर पूरा माहौल गूंज उठता है।

बुजुर्ग इन आयोजनों के जरिए नई पीढ़ी को पर्व की परंपराओं और लोक संस्कृति से जोड़ते हैं। इस तरह घी संक्रांति सिर्फ घी खाने का त्योहार नहीं, बल्कि खेती, पशुधन, प्रकृति, परिवार और पहाड़ी लोक संस्कृति के प्रति आभार जताने का पर्व है।

हरेला की भांति यह पर्व भी ऋतु पर आधारित है। हरेला बीजों के अंकुरित होकर हरियाली धारण कर लेने का सूचक है, वहीं यह पर्व इन फसलों में बालियाँ आने पर मना।या जाता है। वास्तव में यह वही समय होता है जब धान, मंडुवा, कौणी और मक्का जैसी फसलों में बालियां आने लगती हैं। पहाड़ों में इस समय अत्यधिक वर्षा होती है, जिस कारण यहाँ विभिन्न प्रकार के रोग-व्याधियां लगने की संभावना रहती है। खुद को स्वस्थ और निरोगी रखने के लिए यहाँ के लोगों ने अपने पशुधन से प्राप्त घी को प्राथमिकता दी और घी-त्यार मनाने की परम्परा शुरू की।

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