July 24, 2026

आषाढ़ मास की योगिनी एकादशी पर बन रहा विशेष संयोग; गृहस्थों और वैष्णव संप्रदाय के लिए पंचांग ने जारी किए अलग-अलग शुभ मुहूर्त

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नई दिल्ली । सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना और आत्मशुद्धि के लिए सबसे उत्तम और पवित्र दिनों में गिना जाता है। इसी कड़ी में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी का स्थान बेहद विशिष्ट माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में इसे समस्त कष्टों और अनजाने में हुए पापों को दूर करने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। इस वर्ष वर्ष 2026 में एक खास ज्योतिषीय और खगोलीय स्थिति बन रही है, क्योंकि एकादशी तिथि 10 जुलाई और 11 जुलाई, दोनों ही तारीखों को स्पर्श कर रही है। इसी तिथि विस्तार के कारण देश भर के श्रद्धालुओं और व्रत रखने वाले परिवारों के मन में सही तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वैदिक पंचांग की गणना और शास्त्रों के नियमों के आधार पर ज्योतिषाचार्यों ने इस भ्रम को दूर करते हुए सही तिथि और शुभ मुहूर्त का निर्धारण किया है।

वैदिक पंचांग की गणितीय गणना के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर होने जा रहा है। यह तिथि अगले दिन यानी 11 जुलाई 2026, शनिवार की सुबह 5 बजकर 23 मिनट तक प्रभावी बनी रहेगी, जिसके तत्काल बाद द्वादशी तिथि का आगमन हो जाएगा। इस बार एक अनोखा ज्योतिषीय संयोग यह देखने को मिल रहा है कि दोनों ही दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं रहेगी। 11 जुलाई को सूर्योदय होने से पूर्व ही एकादशी तिथि समाप्त हो जाएगी और द्वादशी का आरंभ हो जाएगा। शास्त्रों में इस तरह की स्थिति को तकनीकी रूप से एकादशी क्षय की संज्ञा दी जाती है।

शास्त्रों और पुराणों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जहां किसी भी दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपलब्ध न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखने का विधान सबसे श्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। इस शास्त्रीय मान्यता और पंचांगीय गणना के आधार पर गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले सामान्य श्रद्धालुओं के लिए 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से शास्त्र-सम्मत और उचित रहेगा। वहीं दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय और सन्यासी परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु 11 जुलाई 2026, शनिवार को इस पावन व्रत का संपादन करेंगे।

धार्मिक नियमों के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत के कड़े आचरण और संयम की शुरुआत एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है। दशमी के दिन व्रती को पूरी तरह से सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और हर प्रकार के तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। इस दौरान मूंग, मसूर, गेहूं, जौ और बैंगन जैसी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। एकादशी के मुख्य दिन श्रद्धालुओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थल पर कलश की स्थापना कर भगवान विष्णु के स्वरूप की विधिवत आराधना की जाती है, जिसमें पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

इस व्रत के दौरान कुछ विशेष और कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है, जिसमें सबसे प्रमुख चावल का त्याग है। एकादशी के दिन व्रती के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी चावल का सेवन वर्जित रहता है। इसके अतिरिक्त, एकादशी और द्वादशी दोनों ही दिनों में तुलसी दल यानी तुलसी के पत्ते तोड़ना पूरी तरह निषेध माना गया है, इसलिए पूजा के लिए आवश्यक पत्तों को एक दिन पूर्व ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। व्रत का समापन अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करके किया जाता है। पारण से पूर्व अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न और धन का दान देना पद्म पुराण के अनुसार अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, जो मानव जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

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