नरवर किले को ASI के अधीन करने की पहल, रणथंभौर-कूनो से खजुराहो तक पर्यटन सर्किट बनाने का प्रस्ताव
नरवर का किला अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण क्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है। इससे राजा नल और रानी दमयंती की कथाएं, प्राचीन राजवंशों का इतिहास और ढोला-मारू की प्रेमकथा जैसी लोकपरंपराएं जुड़ी हुई हैं। किले को लेकर प्रचलित मान्यताओं में इसे राजा नल की राजधानी नलपुर से भी जोड़ा जाता है। यहां पसरा देवी और लोढ़ी माता से संबंधित धार्मिक आस्थाएं भी स्थानीय परंपरा का हिस्सा हैं। इन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं के चलते किले के संरक्षण और व्यवस्थित पर्यटन विकास की मांग लंबे समय से उठती रही है।
नरवर किले का इतिहास अलग-अलग राजवंशों और शासकों से जुड़ा रहा है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर नाग राजाओं का शासन होने के उल्लेख मिलते हैं। बाद के दौर में कछवाह राजपूतों ने किले का पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद यहां परिहार और तोमर राजपूतों का अधिकार रहा। 16वीं शताब्दी की शुरुआत में सिकंदर लोदी ने किले पर कब्जा किया। आगे चलकर मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में यह मालवा सूबे के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बना। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में मराठा सिंधिया राजवंश ने इस पर अधिकार कर लिया। किले के ऐतिहासिक भवनों में कचहरी महल भी शामिल है, जिसके जीर्णोद्धार का उल्लेख वर्ष 1925 में महाराजा माधवराव सिंधिया के समय से जुड़ा है।
किला विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। कस्बे से इसकी खड़ी ऊंचाई लगभग 500 फीट बताई जाती है, जबकि समुद्र तल से इसकी ऊंचाई करीब 1,600 फीट है। इसकी भौगोलिक स्थिति और प्राचीन संरचना इसे विशेष पहचान देती है, लेकिन ऊंचाई पर स्थित होने के कारण पर्यटकों के लिए पहुंच आसान बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बेहतर पहुंच मार्ग, नियमित रखरखाव और आवश्यक पर्यटक सुविधाओं की कमी लंबे समय से स्थानीय स्तर पर चिंता का विषय रही है। किले तक सड़क बनाने के लिए वन विभाग और लोक निर्माण विभाग के समन्वय की जरूरत भी उठाई जाती रही है।
किले को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन करने का प्रस्ताव संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक संरचनाओं का व्यवस्थित रखरखाव करना और पुरातात्विक महत्व के अनुरूप उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, प्रस्ताव पर संबंधित विभागों की नियमानुसार कार्रवाई और निर्णय के बाद ही इसके क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट होगी।
पर्यटन विकास के लिए रणथंभौर, कूनो, शिवपुरी, नरवर, ओरछा और खजुराहो को जोड़कर एक सर्किट विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इन स्थलों को एक मार्ग से जोड़ने पर पर्यटकों को वन्यजीव पर्यटन, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक स्थलों को एक ही यात्रा में देखने का अवसर मिल सकता है। इससे नरवर को भी व्यापक पर्यटन मानचित्र पर पहचान मिलने की संभावना है।
पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंच सकता है। गाइड सेवा, होटल, होम-स्टे, परिवहन, खानपान और अन्य पर्यटन सुविधाओं से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को भी इसका फायदा मिल सकता है। फिलहाल, किले के संरक्षण, पहुंच मार्ग और पर्यटन सर्किट से जोड़ने के प्रस्तावों पर संबंधित स्तरों पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
