इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम
इजरायल की संसद में 120 सीटें, बहुमत के लिए 61 जरूरी
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। देश की चुनाव व्यवस्था में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटें आवंटित होती हैं।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दलों का मुकाबला विपक्षी खेमे से है। विपक्ष में गादी आइजनकोट की यशार पार्टी के साथ नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाला टुगेदर गठबंधन तथा अन्य दल भी शामिल हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए इन दलों के बीच समर्थन जुटाने और गठबंधन तैयार करने की प्रक्रिया अहम होगी।
ओपिनियन पोल में क्या संकेत मिले?
चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में अलग-अलग दलों और गठबंधनों की स्थिति को लेकर अंतर दिखाई दिया है। 23 अक्टूबर तक के एक सर्वे औसत में नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 52 सीटें और उनके विरोधी जियोनिस्ट दलों को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान था। दूसरी ओर, कुछ अन्य सर्वेक्षणों में आइजनकोट की पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया।
हालांकि, किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलना और उसके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलना अलग-अलग बातें हैं। चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन और राजनीतिक गठबंधन की बातचीत निर्णायक हो सकती है। इसलिए केवल ओपिनियन पोल के आधार पर नेतन्याहू की विदाई या आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने को तय नहीं माना जा सकता।
चुनाव के चार प्रमुख मुद्दे
पहला मुद्दा 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से जुड़ी सुरक्षा चूक है। उस हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की तैयारियों पर सवाल उठे थे। विपक्षी नेताओं ने सरकार से जवाबदेही की मांग की है। इस चुनाव में मतदाताओं के लिए यह अहम सवाल है कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए किस तरह की सुरक्षा नीति अपनाई जाएगी।
दूसरा बड़ा मुद्दा अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट है। इजरायल में अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, लेकिन धार्मिक अध्ययन करने वाले हरेदी समुदाय के कई लोगों को इससे छूट मिलती रही है। इस व्यवस्था को लेकर देश में विवाद है। आइजनकोट सहित विपक्ष के कई नेता सैन्य सेवा की जिम्मेदारी अधिक व्यापक रूप से लागू करने के पक्ष में हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को हरेदी दलों का समर्थन मिलता रहा है।
तीसरा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और न्यायपालिका में सुधार का है। नेतन्याहू सरकार के न्यायिक बदलावों के प्रस्तावों के विरोध में देश में बड़े प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई, जबकि सरकार के समर्थकों ने बदलावों को सुधार की जरूरत से जोड़ा।
चौथा प्रमुख विषय युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का भविष्य है। मतदाताओं के सामने सुरक्षा सुनिश्चित करने, लंबे संघर्ष की कीमत और भविष्य की सैन्य रणनीति से जुड़े सवाल हैं। नेतन्याहू ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जबकि विपक्ष ने सरकार के फैसलों और युद्ध प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं।
नेतन्याहू और आइजनकोट की सैन्य पृष्ठभूमि
बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायली सेना की विशेष इकाई सायरेट मटकल में सेवा दी थी। उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मौत हो गई थी।
गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में सैनिक के रूप में अपना सैन्य करियर शुरू किया। करीब चार दशक की सेवा के बाद वह 2015 में इजरायली सेना के प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे। दिसंबर 2023 में गाजा में युद्ध के दौरान उनके बेटे गैल की मौत हो गई थी। अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए थे।
चुनाव के बाद सरकार बनाने की चुनौती
मतदान के बाद तस्वीर इस बात से स्पष्ट होगी कि कौन-से दल कितनी सीटें हासिल करते हैं और कौन बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाता है। यदि कोई गठबंधन 61 सीटों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। छोटे दलों और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालांकि अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक मतभेद गठबंधन की राह में बाधा बन सकते हैं।
इसलिए इजरायल के चुनाव का परिणाम केवल सबसे बड़ी पार्टी तय नहीं करेगा। सरकार किसकी बनेगी, यह संसद में बहुमत जुटाने और चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।
