शिवपुरी में करवा चौथ पर रात 8:25 बजे होगा चंद्रोदय, भद्रा और शुक्रास्त का दोष नहीं, जानें व्रत से जुड़ी खास बातें
करवा चौथ विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखने वाला पर्व है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। परंपरा के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास करती हैं और शाम को निर्धारित विधि से पूजा करती हैं। चंद्रमा निकलने के बाद उसके दर्शन और पूजा के साथ व्रत का पारण किया जाता है। इसी वजह से चंद्रोदय के समय को लेकर महिलाओं में खास उत्सुकता रहती है।
इस बार पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए भी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए किसी विशेष धार्मिक बाधा का उल्लेख नहीं है। ऐसे में नवविवाहित महिलाएं भी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार इस पर्व की तैयारी कर सकती हैं।
आचार्य पं. प्रमोद शास्त्री के अनुसार, करवा चौथ के दिन शुक्रास्त का दोष नहीं रहेगा। उनके मुताबिक, शुक्र का उदय 28 अक्टूबर की सुबह हो जाएगा। इसके साथ ही इस बार पर्व के दिन भद्रा भी नहीं है। इन ज्योतिषीय स्थितियों के कारण व्रत रखने वाली महिलाएं बिना इन विशेष बाधाओं की चिंता किए पूजा की तैयारी कर सकती हैं। धार्मिक मान्यताओं में इन स्थितियों को पर्व के आयोजन से जोड़कर देखा जाता है।
इस बार करवा चौथ पर रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के साथ शिव योग का संयोग भी बताया गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा का वृषभ राशि में होना शुभ माना जाता है। इसे वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और आपसी तालमेल का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, ये धारणाएं धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।
करवा चौथ का पर्व केवल उपवास तक सीमित नहीं है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना से भी जुड़ा हुआ है। महिलाएं इस दिन विशेष पूजा की तैयारी करती हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत रखती हैं। दिनभर उपवास के बाद शाम को पूजा की जाती है और चंद्रमा के निकलने का इंतजार किया जाता है।
चंद्रमा के दर्शन होने पर महिलाएं उसे अर्घ्य देती हैं और पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। कई घरों में इस अवसर पर परिवार के सदस्य भी पूजा में शामिल होते हैं। छतों और खुले स्थानों पर चांद का इंतजार करते परिवारों के बीच यह परंपरा पर्व का प्रमुख हिस्सा बनी रहती है।
करवा चौथ को बंगाल में दशरथ चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व से जुड़ी परंपराओं और पूजा की विधियों में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन पति की लंबी उम्र और दांपत्य जीवन की खुशहाली की कामना इसका प्रमुख भाव है। शिवपुरी में भी महिलाएं चंद्रोदय के संभावित समय को ध्यान में रखते हुए पूजा और व्रत की तैयारियां करेंगी।
