ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर, 125 किमी रूट का 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा
नई दिल्ली ।उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रेल कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना पर काम किया जा रहा है। लगभग 125 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन गढ़वाल हिमालय के भीतर तक रेल नेटवर्क पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। परियोजना पूरी होने पर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक यात्रा करना आसान हो सकेगा। इससे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों तक पहुंचने वाले यात्रियों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा के लिए भी यह रेल मार्ग उपयोगी साबित हो सकता है।
इस परियोजना के तहत रेल लाइन 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी और ऋषिकेश को कर्णप्रयाग से जोड़ेगी। पहाड़ी इलाकों में रेल परिवहन का विस्तार होने से यात्रियों को सड़क मार्ग के अलावा एक अन्य विकल्प उपलब्ध होगा। इसके साथ ही धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने की संभावना है। बेहतर परिवहन सुविधाएं स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहां आने वाले पर्यटकों के लिए भी आवागमन को सुविधाजनक बना सकती हैं।
परियोजना का प्रस्तावित अंतिम स्टेशन कर्णप्रयाग है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह स्थान भारत-चीन सीमा से लगभग 123 किलोमीटर दूर है। हालांकि, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नहीं जाती। इसका प्रमुख उद्देश्य गढ़वाल क्षेत्र के अंदरूनी हिस्सों को रेल नेटवर्क से जोड़ना और हिमालयी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं को बेहतर बनाना है। इसके बावजूद सीमा के करीब स्थित क्षेत्रों तक पहुंच मजबूत करने के लिहाज से इस परियोजना का रणनीतिक महत्व भी है।
इस रेल लाइन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसका बड़ा सुरंग नेटवर्क है। पहाड़ी भूभाग और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण परियोजना का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों के भीतर से गुजरने की योजना है। इसमें 28 मुख्य और एस्केप सुरंगें बनाई जा रही हैं। इसके अलावा रेल मार्ग पर 57 बड़े और छोटे पुल भी शामिल हैं। सुरंगों और पुलों का निर्माण पहाड़ों के बीच रेल लाइन को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है, क्योंकि इस क्षेत्र में ऊंचाई, चट्टानों और जमीन की बनावट से जुड़ी कई चुनौतियां मौजूद हैं।
हिमालय में सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरों को कमजोर चट्टानों, भूजल और जमीन की स्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ स्थानों पर पानी से भरी भूगर्भीय परतें खुदाई के काम को कठिन बना सकती हैं। कमजोर जमीन में खुदाई के दौरान बदलाव होने से सुरंग की दीवारों पर दबाव पड़ने का जोखिम भी रहता है। इसलिए निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियों का आकलन करना और जरूरत के मुताबिक सुरंग को मजबूती देना महत्वपूर्ण होता है।
इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सुरंग निर्माण से पहले भूगर्भीय जांच की गई। टनल बोरिंग मशीन यानी टीबीएम के इस्तेमाल से जुड़े फैसलों में भी जमीन और चट्टानों की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। अलग-अलग स्थानों पर मौजूद भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुसार निर्माण तकनीक चुनना जरूरी है, ताकि काम को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र में संवेदनशील सीमा होने के कारण बेहतर परिवहन नेटवर्क का महत्व बढ़ जाता है। ऊंचे पहाड़, प्रतिकूल मौसम और सीमित परिवहन सुविधाएं कई इलाकों तक पहुंच को कठिन बनाती हैं। ऐसे में सड़क, पुल और रेल संपर्क को मजबूत करना क्षेत्रीय आवागमन के लिए उपयोगी हो सकता है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से यात्रियों, श्रमिकों और सामान की आवाजाही को सहारा मिलने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, यह परियोजना धार्मिक पर्यटन और स्थानीय विकास के साथ हिमालयी क्षेत्र में परिवहन संपर्क बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम है। रेल नेटवर्क के विस्तार से गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों तक पहुंच आसान हो सकती है, जबकि सुरंगों और पुलों का व्यापक निर्माण इस परियोजना की तकनीकी जटिलता और महत्व को दर्शाता है।
