पीस बॉन्ड क्या है और नेहा बोरा ने इसे भरने से क्यों किया इनकार, जानिए नियम और जेल तक पहुंचने की वजह
पीस बॉन्ड को सामान्य तौर पर शांति बनाए रखने का कानूनी आश्वासन माना जाता है। यह अपने आप में किसी अपराध की सजा नहीं है, बल्कि भविष्य में शांति भंग होने की आशंका को रोकने के उद्देश्य से की जाने वाली निवारक कार्रवाई है। इसमें संबंधित व्यक्ति को निर्धारित अवधि तक शांति बनाए रखने का वचन देना पड़ सकता है। आदेश के अनुसार बॉन्ड की राशि तय की जाती है और कुछ मामलों में जमानतदार की आवश्यकता भी हो सकती है। इसका उद्देश्य किसी संभावित विवाद या कानून-व्यवस्था की समस्या को पहले ही रोकना है।
इस प्रक्रिया का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में है। पहले इसी तरह की कार्रवाई का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 में था। अब BNSS की धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है, जिसके बारे में शांति भंग करने की आशंका से जुड़ी सूचना मिली हो। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।
BNSS की धारा 130 के तहत मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक आदेश में सूचना का सार, बॉन्ड की राशि, उसकी अवधि और अन्य आवश्यक विवरण दर्ज करने होते हैं। इसके बाद धारा 135 के तहत जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। जांच के दौरान कुछ परिस्थितियों में अंतरिम बॉन्ड भरने का आदेश भी दिया जा सकता है। यदि संबंधित व्यक्ति आदेश का पालन नहीं करता, तो कानून के प्रावधानों के अनुसार उसकी हिरासत का प्रश्न उठ सकता है। जांच पूरी होने पर धारा 136 के तहत अंतिम आदेश जारी किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी कार्रवाई की वैधता संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करती है।
नेहा बोरा को यह नोटिस अक्टूबर में विरोध प्रदर्शनों से जुड़े घटनाक्रम के बाद मिला था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 16 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। वह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने जा रही थीं और अगले दिन उन्हें रिहा कर दिया गया। इसके बाद उन्हें BNSS की धारा 126, 130 और 135(3) के तहत नोटिस जारी किया गया। इसमें उन्हें 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने के लिए कहा गया था।
नेहा की याचिका में दावा किया गया है कि नोटिस में आरोपों को साबित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं दी गई। उनके अनुसार, इसमें किसी विशेष घटना और उसकी अवधि का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा आयोजित करने, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और कनॉट प्लेस जाने के लिए उकसाने से जुड़े आरोपों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
पीस बॉन्ड नहीं भरने के कानूनी परिणाम भी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। यदि जांच के बाद मजिस्ट्रेट वैध अंतिम आदेश जारी करता है और संबंधित व्यक्ति निर्धारित बॉन्ड नहीं भरता, तो BNSS की धारा 141 के तहत उसे हिरासत में रखने या जेल भेजने की स्थिति बन सकती है। कानून के तहत साधारण कारावास की अवधि अधिकतम एक वर्ष तक हो सकती है। यह परिणाम केवल बॉन्ड भरने से शुरुआती इनकार के आधार पर स्वतः लागू नहीं होता, बल्कि संबंधित कानूनी प्रक्रिया और आदेश पर निर्भर करता है।
वहीं, बॉन्ड भरने के बाद उसकी शर्तों का उल्लंघन साबित होने पर भी कार्रवाई हो सकती है। परिस्थितियों के अनुसार बॉन्ड की राशि जब्त की जा सकती है और कानून के तहत हिरासत या कारावास से जुड़े आदेश दिए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में संबंधित आदेश और लागू कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण होते हैं।
इस विवाद में एक अन्य घटनाक्रम कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर पीस बॉन्ड भरा था। इसके विपरीत, नेहा बोरा के वकीलों ने बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करने का रुख रखा। अब मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या शांति भंग होने की आशंका के आधार पर जारी नोटिस पर्याप्त तथ्यों पर आधारित था और क्या संबंधित प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला इस विवाद में आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।
