October 23, 2026

MP में मछली पालन से निर्यात तक बड़ा प्लान, ₹7,430 करोड़ के निवेश से 4 जलाशयों में लगेंगे केज, लाखों रोजगार की उम्मीद

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भोपाल । मध्यप्रदेश में मछली पालन को बड़े उद्योग और अंतरराष्ट्रीय निर्यात कारोबार के रूप में विकसित करने की तैयारी तेज हो गई है।प्रदेश के प्रमुख जलाशयों में आधुनिक तकनीक से मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ प्रसंस्करण भंडारण परिवहन और विपणन की पूरी व्यवस्था तैयार करने की योजना बनाई गई है। सरकार का लक्ष्य अगले तीन वर्षों में मछली उत्पादन दोगुना करना और मध्यप्रदेश को देश के प्रमुख मत्स्य निर्यात केंद्रों में शामिल करना है। इस दिशा में चार बड़े जलाशयों में आधुनिक केज कल्चर विकसित करने और निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया जा रहा है।

इस परियोजना के तहत इंदौर की कामदार्स केयर और कुवैत की जबेदी अल कुवैत फिशरीज कंपनी के बीच करीब 7 हजार 430 करोड़ रुपये के निवेश और बाय-बैक व्यवस्था से जुड़ा समझौता हुआ है। योजना के अनुसार इंदिरा सागर बरगी बाणसागर और बारना जलाशयों में आधुनिक तकनीक के जरिए मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए सुविधाएं विकसित की जाएंगी। परियोजना से करीब चार लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त मछली उत्पादन का लक्ष्य बताया गया है। हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करना परियोजना के क्रियान्वयन निवेश और तकनीकी व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।

केज कल्चर इस योजना का प्रमुख हिस्सा है। इसमें जलाशय के भीतर जाल से बने विशेष पिंजरों में नियंत्रित तरीके से मछलियां पाली जाती हैं। इस तकनीक से उपलब्ध जलक्षेत्र का बेहतर इस्तेमाल करते हुए बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। मध्यप्रदेश में करीब 4.50 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र मत्स्य पालन के लिए उपलब्ध बताया गया है। वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 4.95 लाख मीट्रिक टन से अधिक मछली उत्पादन दर्ज किया गया जो अब तक का सर्वाधिक बताया गया है।

केंद्र सरकार के रिजर्वायर फिशरीज क्लस्टर कार्यक्रम के तहत रायसेन के सम्राट अशोक सागर यानी हलाली जलाशय और खंडवा के इंदिरा सागर जलाशय को मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां मछली के बीज और चारे की उपलब्धता से लेकर उत्पादन निकासी प्रसंस्करण शीत भंडारण परिवहन और मार्केटिंग तक की व्यवस्था तैयार करने पर जोर रहेगा। हलाली जलाशय में वर्ष 2024-25 के दौरान मछली उत्पादकता 361 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष दर्ज की गई थी जो 2025-26 में 319 किलोग्राम रही। विभागीय जानकारी के अनुसार मध्यम श्रेणी के जलाशयों में यह उत्पादकता सबसे अधिक बताई गई है। वैज्ञानिक तरीके से पालन और बेहतर प्रबंधन के जरिए यहां उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

मध्यप्रदेश एकीकृत मत्स्योद्योग नीति-2026 के तहत जलाशयों में करीब एक लाख केज स्थापित करने और अगले तीन वर्षों में मछली उत्पादन दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही मछली पालन को दूसरी कृषि आधारित गतिविधियों से जोड़ने की योजना भी बनाई गई है। उपयुक्त क्षेत्रों में मछली पालन के साथ बतख और कुक्कुट पालन मोती उत्पादन कमल सिंघाड़ा और मखाने की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। एक्वापोनिक्स हाइड्रोपोनिक्स और ग्रीनहाउस तकनीक के जरिए सब्जियां फूल और औषधीय पौधे उगाने की संभावनाएं भी विकसित की जाएंगी।

इस एकीकृत मॉडल से मछुआरों और किसानों को आय के अतिरिक्त स्रोत मिल सकते हैं। मछली उत्पादन बढ़ने के साथ प्रसंस्करण पैकेजिंग शीत भंडारण और परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। ग्रामीण युवाओं और महिला स्व-सहायता समूहों को भी इससे रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिल सकते हैं।

प्रदेश की एकीकृत मत्स्योद्योग नीति के तहत अब तक करीब 40 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने की जानकारी दी गई है। इनके जरिए मत्स्य बीज चारा प्रसंस्करण प्रयोगशालाएं शीत भंडारण और निर्यात जैसी सुविधाओं को विकसित करने की योजना है। इन प्रस्तावों से करीब 3.5 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार व स्वरोजगार के अवसर बनने का अनुमान लगाया गया है। भोपाल में आयोजित फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव-2026 में निवेश और निर्यात से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के साथ मत्स्य निवेश एवं निर्यात मार्गदर्शिका जारी करने की योजना है। अब इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश प्रस्ताव कितनी तेजी से जमीन पर उतरते हैं और मछुआरों को उत्पादन से लेकर बिक्री तक कितना लाभ मिलता है।

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