October 16, 2026

उज्जैन के सती माता मंदिर में पेड़ों पर टंगी सैकड़ों तस्वीरें, शत्रुनाश साधना की मान्यता से जुड़ी अनोखी परंपरा

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उज्जैन । मध्य प्रदेश के उज्जैन में धार्मिक आस्था और तंत्र साधना से जुड़ी मान्यताओं के बीच एक ऐसा मंदिर चर्चा में है जहां पेड़ों पर महिला और पुरुषों की तस्वीरें टंगी दिखाई देती हैं। कुछ तस्वीरों पर कीलें ठुकी हैं तो कहीं सैंडल और कपड़ों से बने पुतले भी नजर आते हैं। भैरवगढ़ क्षेत्र में विक्रांत भैरव मंदिर के पास स्थित इस स्थान को सती माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे मेलडी माता मंदिर भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां शत्रुनाश से जुड़े कर्मकांड कराए जाते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर और यहां दिखाई देने वाली इन वस्तुओं को लेकर लोगों की उत्सुकता बढ़ गई है।
सती माता मंदिर उज्जैन के ओखलेश्वर रोड पर काल भैरव मंदिर के नजदीक स्थित है। मंदिर परिसर के आसपास पेड़ों पर तस्वीरें और दूसरी वस्तुएं टंगी दिखाई देती हैं। मौके पर पहुंची दैनिक भास्कर की टीम को आधा दर्जन से अधिक पेड़ों पर महिला और पुरुषों की तस्वीरें मिलीं। कुछ जगह कपड़े और सैंडल लटक रहे थे तो कहीं नींबू-मिर्च और कपड़ों से बनाए गए पुतले नजर आए। कुछ तस्वीरों पर कीलें भी ठुकी हुई थीं। श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच इन वस्तुओं को शत्रुनाश से जुड़ी मान्यताओं के साथ देखा जाता है। हालांकि इन कर्मकांडों के पीछे हर व्यक्ति का उद्देश्य एक जैसा है या नहीं इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सोशल मीडिया पर भी किसी विरोधी की तस्वीर पेड़ पर टांगने को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आती रहती हैं। ऐसी सामग्री देखने के बाद कुछ लोग इस स्थान के बारे में जानने के लिए पहुंचते हैं। हालांकि तस्वीर टांगने या किसी विशेष कर्मकांड से किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इस तरह की मान्यताओं को धार्मिक विश्वास और लोक परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी तस्वीर पर कील ठोकने या कपड़े का पुतला टांगने से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन पर असर पड़ता है ऐसा प्रमाणित नहीं है।
तांत्रिक भय्यू महाराज के अनुसार यहां आने वाले कुछ लोग निजी और पारिवारिक विवादों से परेशान रहते हैं। इनमें सास-बहू के झगड़े और विवाहेतर संबंधों से जुड़े विवाद जैसे मामले भी शामिल बताए जाते हैं। उनका दावा है कि कुछ लोग अपने विरोधियों से छुटकारा पाने की इच्छा लेकर यहां पूजन कराते हैं। हालांकि इन दावों की पुष्टि के लिए कोई स्वतंत्र प्रमाण या आंकड़े सामने नहीं आए हैं। इसलिए मंदिर में होने वाले प्रत्येक कर्मकांड को किसी एक उद्देश्य से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
भय्यू महाराज का यह भी कहना है कि मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात महाराष्ट्र और राजस्थान से भी लोग यहां पहुंचते हैं। गुजरात में कुछ तांत्रिक कर्मकांडों पर पाबंदियों के बाद वहां से आने वाले लोगों की संख्या बढ़ने का दावा भी किया गया है। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया। उज्जैन का भैरवगढ़ क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। यहां विक्रांत भैरव और काल भैरव मंदिर जैसे धार्मिक स्थल हैं। इसके आसपास चक्रतीर्थ और ओखलेश्वर जैसे श्मशान घाट भी स्थित हैं। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में भैरव उपासना और श्मशान से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन स्थलों की निकटता अपने आप में यहां होने वाले सभी कर्मकांडों को तंत्र साधना साबित नहीं करती।
मंदिर के नाम को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अलग-अलग बातें सामने आती हैं। भय्यू महाराज के मुताबिक इसका मूल नाम सती माता मंदिर है और यहां सती माता की चरण पादुकाओं के साथ मेलडी माता की प्रतिमा भी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इसे मुख्य रूप से सती माता मंदिर कहा जाता था लेकिन बाद में मेलडी माता नाम का प्रचलन बढ़ा। मंदिर के नाम में यह बदलाव कब और क्यों हुआ इसकी स्पष्ट पुष्टि नहीं हो सकी है।
गुजरात की कुछ लोक मान्यताओं में मेलडी माता से जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार देवी पार्वती ने अमुहा नाम के राक्षस का वध करने के लिए मेलडी माता का रूप धारण किया था। कुछ परंपराओं में उन्हें मां मसान मेलडी भी कहा जाता है और मसान शब्द को श्मशान से जोड़ा जाता है। ये धार्मिक लोककथाएं और आस्थाएं हैं जिन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं माना जा सकता। उज्जैन का यह मंदिर अपनी अनोखी निशानियों और उनसे जुड़ी मान्यताओं के कारण चर्चा में बना हुआ है लेकिन शत्रुनाश के दावों को प्रमाणित तथ्य के बजाय स्थानीय विश्वास के रूप में समझना जरूरी है।

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