सीहोर में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने के विरोध में भोपाल कूच, 35 से अधिक गांवों के हजारों लोगों ने उठाई न्याय की मांग
आदिवासियों की ओर से निकाली जा रही पदयात्रा में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल हैं। प्रदर्शनकारी बैनर और तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यह आंदोलन शुरुआत में कोसमी गांव के 12 आदिवासी परिवारों को बेदखल किए जाने के विरोध में शुरू हुआ था, लेकिन अब आसपास के दर्जनभर गांवों के लोग भी इसमें शामिल हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि उनके साथ हुई कार्रवाई की जांच हो और प्रभावित परिवारों को न्याय मिले।
इस मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, सीहोर के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित संबंधित अधिकारियों से तीन दिन के भीतर जवाब मांगा है। आयोग की ओर से जवाब तलब किए जाने के बाद मामला प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की ओर से दिए गए जवाब की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कोसमी गांव में 11 अक्टूबर को वन विभाग की कार्रवाई के दौरान 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े गए थे। प्रभावित परिवारों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस कार्रवाई में उनकी फसलें बर्बाद कर दी गईं और एक कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। घटना के विरोध में ग्रामीणों ने गांव में लगातार तीन दिन तक धरना दिया था। उनका कहना है कि मकान टूटने और फसलें नष्ट होने से परिवारों के सामने रहने और आजीविका से जुड़ी समस्याएं खड़ी हो गई हैं।
घटना के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और विधायक रमाकांत भार्गव प्रभावित आदिवासी परिवारों से मिलने पहुंचे थे। केंद्रीय कृषि मंत्री ने वन विभाग की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे अत्याचार की पराकाष्ठा बताते हुए धरने पर बैठकर प्रभावित परिवारों की शिकायतें सुनी थीं। इस घटनाक्रम के बाद मामला राजनीतिक रूप से भी चर्चा में आ गया।
दूसरी ओर, प्रशासन की रिपोर्ट में संबंधित जमीन पर कब्जे को अवैध बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वन विभाग की ओर से यह कहा गया है कि आरक्षित वन भूमि पर पौधे काटकर अतिक्रमण किया गया था। इस तरह मामले में प्रदर्शनकारियों के आरोप और प्रशासन का पक्ष अलग-अलग हैं। जमीन पर कब्जे की स्थिति और कार्रवाई से जुड़े मुद्दे विवाद के प्रमुख बिंदु बने हुए हैं।
प्रदर्शनकारी आदिवासी परिवारों की मांग है कि जिस जमीन पर वे पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं, उसका पट्टा दिया जाए। इसके अलावा बेदखल परिवारों के पुनर्वास, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था करने तथा नष्ट हुई फसलों के लिए मुआवजा देने की मांग भी उठाई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रभावित परिवारों की जरूरतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए और उन्हें रहने तथा आजीविका के लिए उचित व्यवस्था मिलनी चाहिए।
आंदोलन में शामिल लोग कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। भोपाल कूच का उद्देश्य मुख्यमंत्री के सामने अपनी शिकायतें और जमीन से संबंधित दस्तावेज रखना है। अब इस मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा मांगे गए जवाब, प्रशासन के पक्ष और प्रदर्शनकारियों की मांगों पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
