माता वैष्णो देवी से जुड़े रहस्यों की पूरी कथा, जानें पंडित श्रीधर, बाणगंगा और भैरवनाथ से जुड़ी मान्यताएं
मान्यता के अनुसार, पंडित श्रीधर कटरा के पास हंसली गांव में रहते थे और धार्मिक तथा सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वह अक्सर दुखी रहते थे। एक बार उन्होंने गांव के लोगों के लिए भंडारे का आयोजन करने का निर्णय लिया। भंडारे से एक रात पहले उन्हें चिंता थी कि उपलब्ध सामग्री से इतने लोगों का भोजन कैसे कराया जाएगा। अगले दिन जब वह पूजा कर रहे थे और गांव के लोग पहुंचने लगे, तब एक तेजस्वी कन्या वहां आई। उसका नाम वैष्णवी बताया जाता है। उसने भंडारे की पूरी व्यवस्था संभाली और सभी लोगों को भोजन कराया। भंडारा पूरा होने के बाद वह अचानक वहां से गायब हो गई।
कहा जाता है कि कुछ समय बाद वही कन्या पंडित श्रीधर के सपने में आई और उन्हें एक पवित्र गुफा के बारे में बताया। मान्यता है कि उसने पंडित श्रीधर को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी दिया। इसके बाद श्रीधर समझ गए कि भंडारे में आई कन्या साधारण बालिका नहीं, बल्कि स्वयं माता वैष्णो देवी थीं। उन्होंने उस पवित्र गुफा की खोज की और इसी के बाद इस स्थान पर माता की भक्ति और दर्शन की परंपरा आगे बढ़ती गई। इसी कथा में भैरवनाथ का प्रसंग भी आता है। मान्यता है कि भंडारे में पहुंचे भैरवनाथ ने वैष्णवी से मांसाहारी भोजन की मांग की, जबकि वहां केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन उपलब्ध था। इसके बाद उन्होंने वैष्णवी का पीछा करना शुरू कर दिया।
मान्यता के अनुसार, वैष्णवी त्रिकुटा पर्वत की ओर चली गईं और भैरवनाथ भी उनके पीछे पहुंचे। यात्रा के दौरान हनुमान जी भी माता की रक्षा के लिए उनके साथ थे। जब हनुमान जी को प्यास लगी तो माता ने धनुष से धरती पर बाण चलाया, जिससे जलधारा निकली। कहा जाता है कि माता ने इसी जलधारा में अपने केश धोए थे और इसी कारण इसे बाणगंगा कहा गया। इसके बाद माता एक गुफा में चली गईं और वहां तपस्या करने लगीं। मान्यता है कि हनुमान जी गुफा के बाहर उनकी रक्षा करते रहे। भैरवनाथ वहां भी पहुंच गए। एक साधु ने उन्हें बताया कि जिस कन्या का वह पीछा कर रहे हैं, वह देवी का स्वरूप हैं, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी। माता गुफा से दूसरे रास्ते से बाहर निकलीं और इस स्थान को अर्धकुंवारी या अर्धकुमारी कहा जाता है।
इसके बाद मान्यता है कि माता वैष्णो देवी ने अपना दिव्य स्वरूप धारण कर भैरवनाथ को लौट जाने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने पीछा जारी रखा। इस दौरान हनुमान जी और भैरवनाथ के बीच युद्ध हुआ। जब युद्ध लंबा खिंचने लगा तो माता ने स्वयं बाहर आकर भैरवनाथ का वध कर दिया। कहा जाता है कि भैरवनाथ का सिर जिस स्थान पर गिरा, वह आज भैरव घाटी के नाम से जाना जाता है और वहीं भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है। भैरवनाथ ने अपनी गलती स्वीकार कर माता से क्षमा मांगी। मान्यता है कि माता ने उन्हें वरदान दिया कि उनके दर्शन के बिना माता की यात्रा पूरी नहीं मानी जाएगी। इसी वजह से श्रद्धालु माता के भवन में दर्शन के बाद भैरवनाथ मंदिर भी जाते हैं। इस तरह बाणगंगा, अर्धकुंवारी, भवन और भैरव घाटी माता वैष्णो देवी की यात्रा से जुड़े प्रमुख पवित्र पड़ाव माने जाते हैं।
