September 21, 2026

डोल ग्यारस के दिन जरूर करें भगवान विष्णु की पूजा जानिए शुभ मान्यता और इस पर्व से जुड़ी खास परंपराएं

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नई दिल्ली। डोल ग्यारस हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। इसे जलझूलनी एकादशी और परिवर्तिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में इस दिन भगवान की विशेष पूजा अर्चना की जाती है और मंदिरों से डोल यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में इसमें शामिल होकर भगवान के दर्शन करते हैं और सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

डोल ग्यारस का पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। कई स्थानों पर भगवान की प्रतिमा को सुंदर तरीके से सजाकर डोल में विराजमान किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु भगवान को जलाशय या नदी के किनारे ले जाते हैं। वहां पूजा अर्चना और जल से संबंधित धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। इसी वजह से इस पर्व को जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है।

डोल ग्यारस के दिन व्रत रखने की परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और धार्मिक मान्यता के अनुसार उपवास रखते हैं। कुछ लोग पूरे दिन निर्जला व्रत करते हैं जबकि कई श्रद्धालु फलाहार करते हैं। सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पूजा में भगवान को पीले फूल तुलसी की पत्तियां फल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। विष्णु मंत्र का जाप करने के साथ भगवान की आरती की जाती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करने से मन को शांति मिलती है।

इस पर्व से जुड़ी डोल यात्रा सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है। कई शहरों और गांवों में मंदिरों से भगवान की सवारी निकाली जाती है। डोल को फूलों और रंग बिरंगी सजावट से सजाया जाता है। श्रद्धालु भजन और कीर्तन करते हुए यात्रा में शामिल होते हैं। कई जगहों पर ढोल नगाड़ों के साथ भगवान की सवारी निकाली जाती है। मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं और पूरे वातावरण में धार्मिक उत्साह नजर आता है।

डोल ग्यारस को लेकर एक धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान विष्णु के शयनकाल में परिवर्तन होता है। इसी कारण यह तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। श्रद्धालु इस दिन दान पुण्य भी करते हैं। जरूरतमंद लोगों को भोजन वस्त्र और अन्य आवश्यक सामग्री देना शुभ माना जाता है। कई लोग गौ सेवा और धार्मिक स्थलों पर सेवा कार्य भी करते हैं।

डोल ग्यारस केवल पूजा और व्रत का पर्व नहीं है बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। डोल यात्रा में अलग अलग वर्गों के लोग एक साथ शामिल होते हैं। मंदिरों में होने वाले आयोजन लोगों को धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। यही वजह है कि आज भी डोल ग्यारस का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा और डोल यात्रा के साथ यह पर्व लोगों के जीवन में सुख शांति और सकारात्मकता की कामना का संदेश देता है।

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