जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज को जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताया चिंताजनक, पुलिस से निष्पक्षता और संयम बरतने की अपील
जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों और युवाओं को अपने विचार रखने तथा विरोध दर्ज कराने का अधिकार है। यदि कोई छात्र किसी मुद्दे पर अलग राय रखता है तो उसके साथ ऐसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, जिससे उसके अधिकार प्रभावित हों। उन्होंने प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ कथित कठोर व्यवहार को निराशाजनक बताया।
उन्होंने पुलिस अधिकारियों की निष्पक्षता को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनके मुताबिक पुलिस से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून को समान रूप से लागू करे और किसी भी परिस्थिति में निष्पक्षता बनाए रखे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पुलिस की इस भूमिका पर सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके लिए जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस को परिस्थितियों को समझते हुए संयमित तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुलिस और आम नागरिकों के बीच विश्वास बना रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आम लोगों के लिए वर्दी पहने पुलिसकर्मी सरकार की शक्ति और अधिकार का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होता है। जब किसी नागरिक को परेशानी होती है तो वह सहायता के लिए पुलिस के पास जाता है। ऐसे में पुलिस की विश्वसनीयता कमजोर होना समाज और कानून व्यवस्था दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि यदि सरकार के अधिकारी ही कानून का उल्लंघन करने लगें तो इसका व्यापक असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में लोगों के बीच कानून के प्रति सम्मान कम हो सकता है और अराजकता को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक देश में सरकारी अधिकारियों से कानून का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने की आवश्यकता को स्वीकार किया है। उनके मुताबिक, राज्य की संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
जस्टिस भुइयां ने ये बातें पूर्व सुरक्षा सचिव यशोवर्धन आजाद की पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में कहीं। राजधानी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब ऐसे अधिकारी प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते दिखाई देते हैं तो यह निराशाजनक स्थिति होती है।
छात्रों के विरोध के अधिकार को लेकर इससे पहले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत भी टिप्पणी कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि छात्रों को किसी भी मुद्दे पर विरोध करने का अधिकार है। लॉ संस्थान के छात्रों के पंजीकरण पर रोक लगाने से जुड़े एक मामले में भी उन्होंने छात्रों के अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया था।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका, बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर बहस जारी है। उनकी टिप्पणियों में कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने तथा पुलिस की निष्पक्षता पर विशेष जोर दिया गया।
