तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"
इस घटना के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तीर्थ में या तीर्थयात्रा के दौरान हो जाए तो हिंदू धर्मग्रंथ इसे किस दृष्टि से देखते हैं? क्या पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है? शास्त्रों और पुराणों में कई तीर्थों में देहत्याग की महिमा बताई गई है, लेकिन इसके साथ कर्म और अंतिम समय के विचारों को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
तीर्थ का अर्थ ही है भवसागर से पार जाने का माध्यम
भारतीय परंपरा में तीर्थ केवल कोई धार्मिक स्थान नहीं है। ‘तीर्थ’ का अर्थ उस स्थान या माध्यम से जुड़ा है, जिसके सहारे मनुष्य संसार के बंधनों से पार जाने का प्रयास करता है। इसी कारण नदियों के तट, पर्वत, देवस्थल और प्राचीन धार्मिक नगर तीर्थ माने गए हैं।
तीर्थयात्रा में स्नान, दर्शन, दान, तप, जप और आत्मशुद्धि जैसी साधनाएं शामिल होती हैं। इसलिए इसे केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं, बल्कि धार्मिक संकल्प और साधना के रूप में देखा गया है।
गीता में अंतिम समय के विचारों को सबसे अधिक महत्व
तीर्थ में मृत्यु की मान्यता को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ महत्वपूर्ण है। आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय में मनुष्य की मानसिक अवस्था और उसके विचारों का महत्व बताते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
अर्थात जो व्यक्ति अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
अगले श्लोक में इसी सिद्धांत को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
अर्थात मनुष्य अंतिम समय में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से केवल मृत्यु का स्थान ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस समय व्यक्ति का चित्त किस अवस्था में था, इसे भी अहम माना गया है।
काशी में मृत्यु को लेकर सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता
तीर्थ में देहत्याग की चर्चा हो तो काशी का उल्लेख सबसे पहले आता है। काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में इसकी विशेष महिमा बताई गई है।
धार्मिक मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले व्यक्ति को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण सदियों से लोग जीवन के अंतिम चरण में काशी जाकर रहने की इच्छा रखते रहे हैं।
हालांकि इतिहास में ‘करवत काशी’ जैसी कठोर परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यताओं में मोक्ष की कामना से लोग काशी में जानबूझकर प्राण त्यागने तक के प्रयास करते थे। मीरा के पदों और कबीर की रचनाओं में भी ‘करवत कासी’ का संदर्भ मिलता है।
केदार की यात्रा और कैलास पहुंचने की कथा
स्कंदपुराण में तीर्थयात्रा से जुड़ी वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ की कथा भी मिलती है। दोनों हिमालय में केदार की यात्रा पर जाते हैं। यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पर हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है।
पुराण की कथा के अनुसार, तीर्थयात्रा के दौरान देह त्यागने और अंतिम समय में चित्त की शुद्ध अवस्था के कारण शिवगण उन्हें दिव्य विमान से कैलास ले जाते हैं। इस कथा में तीर्थयात्री की मृत्यु को शिवलोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है।
गरुड़ पुराण में पवित्र भूमि पर मृत्यु का उल्लेख
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 14 में मृत्यु के बाद धर्मराज की सभा तक पहुंचने वाले पुण्यात्माओं का वर्णन मिलता है। इसमें काशी में मृत्यु, धर्म की रक्षा करते हुए प्राण त्यागने और योग करते हुए शरीर छोड़ने वालों के साथ पवित्र जल में दुर्घटनावश डूबने या पवित्र तीर्थ और पुण्यभूमि में मृत्यु होने का भी उल्लेख किया गया है।
इसमें ऐसे पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज की सभा की ओर जाने वाले उत्तरी मार्ग का वर्णन मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपरा में पुण्यभूमि पर मृत्यु को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है।
पांडवों की कथा बताती है कि केवल स्थान ही सब कुछ नहीं
महाभारत में पांडवों की अंतिम यात्रा का प्रसंग भी इस विषय को अलग दृष्टि से समझाता है। यात्रा के दौरान द्रौपदी और चारों भाई एक-एक करके गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन में मौजूद अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं।
इस प्रसंग से यह विचार सामने आता है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में स्थान के साथ कर्म और चित्त की भी भूमिका है। यानी किसी पवित्र स्थान पर मृत्यु को महत्व दिया गया है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसकी मानसिक अवस्था को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया।
प्रयाग और अयोध्या की भी अलग धार्मिक मान्यताएं
पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उसके आसपास के तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है। इसमें गंगा और यमुना के तट पर स्थित तीर्थों में देह त्यागने की धार्मिक महत्ता बताई गई है। यहां तक कहा गया है कि इन पवित्र तीर्थों में मृत्यु पाने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता।
इसी तरह स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को ‘स्वर्गद्वार’ का मार्ग बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
क्या तीर्थ में मृत्यु से निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है?
शास्त्रीय मान्यताओं को समग्र रूप से देखें तो इसका उत्तर इतना सीधा नहीं है कि तीर्थ में मृत्यु होते ही हर व्यक्ति को निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है। अलग-अलग पुराणों में कुछ तीर्थों की मृत्यु-महिमा जरूर बताई गई है, लेकिन गीता जैसे ग्रंथ अंतिम समय के भाव, स्मरण और चित्त की अवस्था को भी निर्णायक महत्व देते हैं।
यही कारण है कि तीर्थयात्रा को केवल पर्यटन नहीं माना गया। इसमें संयम, उपवास, स्नान, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्तियों से दूरी जैसी साधनाएं जुड़ी हैं।
इस दृष्टि से तीर्थयात्रा धार्मिक संकल्प के साथ शुरू होने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। मान्यता है कि पुण्यभूमि का वातावरण मनुष्य के चित्त को ईश्वर और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाता है। इसलिए तीर्थ में मृत्यु को विशेष पुण्य से जोड़कर देखा गया है, लेकिन उसके साथ व्यक्ति के कर्म और अंतिम मानसिक भाव को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
