अंडे की कीमतों में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी, पोल्ट्री फीड महंगा होने से मक्का और इथेनॉल की बढ़ती मांग बनी अहम वजह
अंडों की कीमत बढ़ने के पीछे पोल्ट्री फीड की बढ़ती लागत को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। मुर्गियों के चारे में मक्का प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा सोयाबीन और दूसरे फीड इनपुट की कीमतों में बदलाव भी पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत को प्रभावित करता है।
मक्के की मांग इस समय केवल पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन का महत्व लगातार बढ़ा है। इस प्रक्रिया में मक्का प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।
इथेनॉल क्षेत्र में मक्के की बढ़ती मांग का सीधा असर इसकी उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। जब एक ही कृषि उत्पाद की मांग अलग-अलग क्षेत्रों से बढ़ती है, तो बाजार में उसकी कीमत पर दबाव बनने की संभावना रहती है। इसका असर उन उद्योगों पर भी पड़ता है जो उसी कच्चे माल पर निर्भर हैं।
पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का फीड का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए मक्के की कीमत में बढ़ोतरी होने पर चारे की लागत बढ़ सकती है। चारे की लागत बढ़ने के बाद उसका प्रभाव मुर्गियों के पालन, उत्पादन लागत और अंततः अंडों के बाजार मूल्य पर दिखाई देता है।
हालांकि अंडों की मौजूदा महंगाई को केवल इथेनॉल की बढ़ती मांग से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। मक्के की कीमत पर पोल्ट्री फीड की मांग, मौसम, उत्पादन में बदलाव और दूसरे कृषि इनपुट की लागत का भी प्रभाव पड़ता है। मुर्गियों की उत्पादकता और बाजार में अंडों की उपलब्धता भी कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आने वाले महीनों में मांग का मौसमी असर भी महत्वपूर्ण हो सकता है। सर्दियों के दौरान अंडों की खपत आम तौर पर बढ़ जाती है। ऐसे में यदि पोल्ट्री फीड की लागत ऊंची बनी रहती है और बाजार में आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं रहती, तो अंडों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
सरकार की ओर से इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की उपलब्धता बढ़ाने और उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के के इस्तेमाल में हुई वृद्धि से इस फसल की औद्योगिक मांग का महत्व बढ़ा है। ESY 2025-26 में इथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 125.78 लाख टन मक्के के इस्तेमाल का अनुमान इसी बढ़ती मांग को दर्शाता है।
मक्के की बढ़ती औद्योगिक मांग और पोल्ट्री क्षेत्र की जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो गया है। यदि मक्के की उपलब्धता बढ़ती है और उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, तो पोल्ट्री उद्योग पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, फीड लागत ऊंची रहने पर इसका असर अंडों की कीमतों में आगे भी दिखाई दे सकता है।
फिलहाल अंडों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी उपभोक्ताओं के साथ पोल्ट्री कारोबार के लिए भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में मक्का उत्पादन, फीड लागत, इथेनॉल की मांग, अंडों की आपूर्ति और मौसमी खपत जैसे कारक मिलकर बाजार की दिशा तय करेंगे।
