खाद की हकीकत आई सामने केंद्र ने भेजा रिकॉर्ड यूरिया फिर भी मचा हाहाकार डीएपी की कमी ने बिगाड़ी किसानों की बुवाई
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या यूरिया की उपलब्धता नहीं बल्कि उसके वितरण और प्रबंधन में रही। केंद्र सरकार का दायित्व राज्य तक खाद पहुंचाने का होता है जबकि जिलों ब्लॉकों और सहकारी समितियों तक समय पर और पारदर्शी वितरण की जिम्मेदारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की होती है। ऐसे में पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद किसानों को समय पर खाद नहीं मिल पाना वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दूसरी ओर खरीफ सीजन में किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती डीएपी खाद की कमी बनकर सामने आई। राज्य को इस अवधि में लगभग 3.57 लाख मीट्रिक टन डीएपी की जरूरत थी लेकिन केवल 3.05 लाख मीट्रिक टन की ही आपूर्ति हो सकी। यानी करीब 52 हजार मीट्रिक टन डीएपी की कमी रही। यही वजह रही कि बुवाई के सबसे महत्वपूर्ण समय में सहकारी समितियों और खाद वितरण केंद्रों पर किसानों की भारी भीड़ उमड़ी और कई स्थानों पर धक्का मुक्की तथा हंगामे की स्थिति भी बनी।
संसद में पेश आंकड़ों से यह भी स्पष्ट हुआ कि एनपीकेएस उर्वरक की स्थिति बेहतर रही। लगभग 4.21 लाख मीट्रिक टन की मांग के मुकाबले राज्य को 6.67 लाख मीट्रिक टन एनपीकेएस उपलब्ध कराया गया। यानी इस उर्वरक की भी पर्याप्त उपलब्धता रही। इसके बावजूद डीएपी की कमी ने खेती की तैयारियों को प्रभावित किया और किसानों की चिंता बढ़ा दी।
केंद्र सरकार ने खाद आपूर्ति की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और निगरानी आधारित बताया है। फसल सीजन शुरू होने से पहले कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्य सरकार के साथ मिलकर महीनेवार जरूरत तय करता है। इसके बाद उर्वरक विभाग राज्यों को आवंटन जारी करता है और रेलवे रैक के माध्यम से खाद की आपूर्ति की जाती है। सभी रैक की निगरानी एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली के जरिए की जाती है तथा हर सप्ताह केंद्र और राज्यों के अधिकारियों के बीच समीक्षा बैठक भी होती है।
मध्य प्रदेश स्वयं भी देश के प्रमुख यूरिया उत्पादक राज्यों में शामिल है। वर्ष 2025-26 में राज्य में लगभग 19.73 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन हुआ जबकि चालू वित्त वर्ष 2026-27 में जून तक ही 5.40 लाख मीट्रिक टन उत्पादन दर्ज किया जा चुका है। इससे पहले वर्ष 2022-23 में राज्य ने 22.37 लाख मीट्रिक टन यूरिया उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया था। देश में आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 के बाद कई नई यूरिया उत्पादन इकाइयों की भी शुरुआत की है।
खाद उपलब्धता के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में वास्तविक चुनौती उत्पादन या केंद्रीय आवंटन की नहीं बल्कि जरूरत के अनुरूप डीएपी उपलब्ध कराने और अंतिम छोर तक समय पर वितरण सुनिश्चित करने की है। यदि वितरण व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद किसानों को हर खरीफ सीजन में इसी तरह परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
