भारत में पहली बार निजी कंपनी का ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च, जानिए क्या है मिशन आगमन ?
यह मिशन इसलिए खास है क्योंकि अब तक भारत में उपग्रहों को कक्षा में भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए होता रहा है। विक्रम-1 की सफलता के साथ निजी कंपनियों के लिए व्यावसायिक अंतरिक्ष लॉन्च सेवाओं का नया रास्ता खुल सकता है।
क्या है मिशन आगमन?
मिशन आगमन, विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इसका प्रक्षेपण सुबह 11:30 बजे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाना है। इस मिशन के जरिए स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी तरीके से विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमता, तकनीक और प्रदर्शन का परीक्षण करेगी।
विक्रम-1 रॉकेट की खासियत
विक्रम-1 का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।
इस रॉकेट की प्रमुख विशेषताएं-
– विक्रम-1 करीब 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है।
– इसे छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
– इसका ढांचा हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से तैयार किया गया है।
– कार्बन फाइबर मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट की दक्षता बढ़ती है।
– इसमें तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं।
– रॉकेट के ऊपरी हिस्से में ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।
– विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में करीब 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने के लिए तैयार किया गया है।
विक्रम-1 में कौन-सी नई तकनीकें?
विक्रम-1 में कई अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिक्विड इंजन पूरी तरह धातु से बने 3डी-प्रिंटेड इंजन हैं। 3डी प्रिंटिंग तकनीक के जरिए ऐसे इंजन बनाए जा सकते हैं जिनके निर्माण में पहले सैकड़ों अलग-अलग पुर्जों की जरूरत पड़ती थी। इससे निर्माण प्रक्रिया तेज होती है और लागत भी कम होती है। इसके अलावा स्काईरूट ने अपना खुद का न्यूमेटिक स्टेज सेपरेशन सिस्टम विकसित किया है, जो मॉड्यूलर और परीक्षण योग्य है। कंपनी के अनुसार इन तकनीकों से रॉकेट को हल्का, अधिक भरोसेमंद और किफायती बनाया गया है।
विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में क्या जाएगा?
– मिशन आगमन में कई खास पेलोड भेजे जाएंगे।
– इनमें बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा तैयार किया गया लैब-निर्मित डायमंड लोटस शामिल है।
इसके अलावा अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी अंतरिक्ष में भेजी जाएगी। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है।
इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी भेजा जाएगा, जिस पर ‘वंदे मातरम’ लिखा है। इसके अलावा स्काईरूट की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के समर्थकों के संदेश भी अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है मिशन आगमन?
– अगर विक्रम-1 सफल होता है तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं दे सकेंगी।
– आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार, यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत कर सकता है।
– वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में हुई थी। कंपनी का लक्ष्य दुनिया भर के उपग्रह संचालकों को किफायती, भरोसेमंद और जरूरत के अनुसार लॉन्च सेवाएं उपलब्ध कराना है। कंपनी को इसरो की परीक्षण सुविधाओं और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच मिलने से विकास में तेजी मिली और लागत कम रखने में मदद मिली।
विक्रम-एस से विक्रम-1 तक का सफर
स्काईरूट ने 18 नवंबर 2022 को अपना पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-एस सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। ‘प्रारंभ’ नाम के इस मिशन ने भारत के पहले निजी रॉकेट लॉन्च का इतिहास बनाया। यह रॉकेट करीब 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और अपने निर्धारित मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए बंगाल की खाड़ी में उतरा। इस मिशन में सॉलिड प्रोपल्शन, कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर, एवियोनिक्स और टेलीमेट्री जैसी तकनीकों का परीक्षण किया गया था, जिनका आधार अब विक्रम-1 में इस्तेमाल किया गया है।
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को कैसे मिला बढ़ावा?
सरकार ने स्पेस स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं—
2023
– भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 लागू की गई।
– इन-स्पेस सीड फंड योजना शुरू की गई।
2024
– अंतरिक्ष क्षेत्र में एफडीआई नियमों को आसान बनाया गया।
– एनजीपी-2024 के जरिए मंजूरी प्रक्रिया को सरल किया गया।
– इन-स्पेस प्री-इन्क्यूबेशन उद्यमिता कार्यक्रम शुरू किया गया।
– स्पेस स्टार्टअप्स के लिए 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड बनाया गया।
2025
– नई अंतरिक्ष तकनीकों के लिए 500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड बनाया गया।
– एसएसएलवी तकनीक हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को हस्तांतरित की गई।
2026
– पीपीपी मॉडल के तहत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह नेटवर्क विकसित करने की पहल शुरू की गई।
भारत में स्पेस स्टार्टअप्स की स्थिति
सरकार के अनुसार, वर्ष 2014 में देश में केवल एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप था, जबकि फरवरी 2026 तक इनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है।
भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में अब तक 50 करोड़ डॉलर (500 मिलियन डॉलर) से अधिक का निवेश हो चुका है। अकेले 2025 में करीब 15 करोड़ डॉलर (150 मिलियन डॉलर) का निवेश आया।
पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियां भारत के नए अंतरिक्ष युग की प्रमुख कंपनियों के रूप में उभर रही हैं।
अगर मिशन आगमन सफल रहता है, तो यह केवल स्काईरूट एयरोस्पेस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक नए दौर की शुरुआत साबित हो सकती है।
