July 15, 2026

क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

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नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही तीन-भाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नई भाषा को सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस नीति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नए नियमों के तहत अंग्रेजी को गैर-मूल भाषा की श्रेणी में रखा गया है, जिससे छात्रों के सामने भाषाई चयन का संकट खड़ा हो गया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दायर नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आगामी 22 जुलाई की तारीख तय की है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने के लिए दस दिनों का समय मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है, हालांकि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और उनके वर्गीकरण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सीबीएसई का यह सर्कुलर बिना उचित कानूनी अधिकार के जारी किया गया है, जो छात्रों पर जबरन भाषा थोपने जैसा है। नई नीति के अनुसार, कक्षा नौ के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो कक्षा पांच से निरंतर एक निश्चित भाषाई पैटर्न का पालन कर रहे हैं। वकीलों ने चिंता जताई कि यदि कोई छात्र संस्कृत के स्थान पर पंजाबी या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा चुनना चाहता है, तो स्कूलों के पास न तो पर्याप्त योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक पाठ्यपुस्तकें।

अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि भले ही बोर्ड ने छात्रों को संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया है, लेकिन देश के सभी स्कूलों के लिए इतने बड़े पैमाने पर भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति करना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके अतिरिक्त, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर निर्धारित समय सीमा के बाद भी केवल तीन भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार की गई इस त्रिभाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर बच्चों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। ऐतिहासिक रूप से इस फॉर्मूले को पहली बार वर्ष 1964-66 में शिक्षा आयोग द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया। नई व्यवस्था के तहत भाषाई चुनाव की प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया है कि यदि कोई छात्र पहली दो भाषाओं के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में एक और भारतीय भाषा या फिर अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा का चयन करना होगा।

प्रशासनिक स्पष्टीकरण के अनुसार, यह नई त्रिभाषा व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 में केवल नौवीं कक्षा के छात्रों पर ही पूरी तरह लागू होगी। वर्तमान में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे छात्र पुरानी द्विभाषी व्यवस्था के तहत ही अपनी बोर्ड परीक्षाएं देंगे। नए नियमों के मुताबिक, यदि कोई छात्र अंग्रेजी विषय का चयन करता है, तो वह अन्य किसी विदेशी भाषा जैसे कोरियन, जापानी, फ्रेंच या जर्मन का चुनाव नहीं कर सकेगा। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल असेसमेंट के दौरान तीसरी भाषा में उत्तीर्ण हुए बिना छात्रों को दसवीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाएगा।

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