July 3, 2026

संतोषी माता व्रत का पूरा विधान जानें कब रखें कैसे करें पूजा और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

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नई दिल्ली । संतोषी माता का व्रत हिंदू धर्म में सबसे लोकप्रिय और श्रद्धा से किए जाने वाले व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से शुक्रवार के दिन रखा जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से संतोषी माता का व्रत करते हैं उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सुख शांति समृद्धि तथा संतोष का वास होता है। यह व्रत महिलाएं और पुरुष दोनों कर सकते हैं। विवाह में बाधा संतान सुख आर्थिक परेशानियों और पारिवारिक कलह जैसी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए भी इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।

संतोषी माता का व्रत किसी भी शुक्रवार से शुरू किया जा सकता है। सामान्य रूप से लगातार 16 शुक्रवार तक यह व्रत रखने की परंपरा है। यदि किसी कारणवश बीच में व्रत छूट जाए तो अगले शुक्रवार से फिर श्रद्धापूर्वक व्रत जारी रखा जा सकता है। व्रत की शुरुआत से पहले माता का स्मरण कर अपनी मनोकामना का संकल्प लिया जाता है।

व्रत वाले दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल में संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। माता को लाल या पीला वस्त्र अर्पित करें और धूप दीप जलाकर पूजा करें। गुड़ और भुने हुए चने का भोग लगाना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। इसके बाद संतोषी माता की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ करें। कथा के बाद आरती करें और प्रसाद सभी लोगों में बांटें।

संतोषी माता के व्रत में सबसे महत्वपूर्ण नियम खट्टी वस्तुओं का त्याग है। व्रत करने वाला स्वयं तो खट्टी चीजें नहीं खाता ही है साथ ही व्रत के दिन किसी अन्य को भी खट्टी वस्तु खिलाने से बचना चाहिए। नींबू इमली आमचूर अचार दही में खट्टापन और अन्य अम्लीय खाद्य पदार्थों से इस दिन परहेज किया जाता है। मान्यता है कि इस नियम का पालन करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

व्रत के दौरान श्रद्धालु दिनभर फलाहार या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। पूजा में माता के समक्ष अपनी मनोकामना व्यक्त करते हुए परिवार की सुख शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। पूरे व्रत काल में संयम सकारात्मक सोच और संतोष का भाव बनाए रखना भी इस व्रत का प्रमुख संदेश माना जाता है।

जब 16 शुक्रवार का व्रत पूरा हो जाए तब उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन संतोषी माता की विशेष पूजा की जाती है और गुड़ चने का प्रसाद वितरित किया जाता है। परंपरा के अनुसार आठ बच्चों को भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा तथा उपहार भी दिए जाते हैं। भोजन में भी किसी प्रकार की खट्टी वस्तु शामिल नहीं की जाती। इसके बाद माता का आशीर्वाद लेकर व्रत का समापन किया जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि संतोषी माता का व्रत केवल मनोकामनाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं बल्कि जीवन में संतोष धैर्य और सकारात्मकता का संदेश भी देता है। जो व्यक्ति श्रद्धा विश्वास और नियमों के साथ यह व्रत करता है उसके जीवन में सुख शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है तथा परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

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