30 दिन की न्यायिक हिरासत पर जाएगी PM-CM की कुर्सी? 130वें संविधान संशोधन विधेयक ने बढ़ाया सियासी तापमान, सरकार और विपक्ष आमने-सामने
प्रस्तावित संशोधन के अनुसार केवल गिरफ्तारी के आधार पर किसी जनप्रतिनिधि का पद समाप्त नहीं होगा। कार्रवाई तभी होगी जब संबंधित व्यक्ति लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहेगा। इसके बाद 31वें दिन प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के मामले में राष्ट्रपति तथा राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्रियों के मामले में राज्यपाल आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करेंगे। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है।
सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का संचालन जेल से नहीं किया जा सकता। उसका तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए जवाबदेही और नैतिक मानकों का पालन आवश्यक है। सरकार का यह भी कहना है कि किसी भी आरोपी को न्यायालय से जमानत पाने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं और यदि 30 दिन बाद भी न्यायिक हिरासत जारी रहती है तो मामले की गंभीरता स्वतः स्पष्ट होती है। साथ ही अदालतों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे और किसी भी राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई की स्थिति में न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।
विपक्ष इस प्रस्ताव का लगातार विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत दोषी घोषित नहीं करती, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है। विपक्ष का आरोप है कि केवल हिरासत को आधार बनाकर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का पद समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। विपक्षी दलों ने यह भी आशंका जताई है कि जांच एजेंसियों के माध्यम से राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाकर इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।
इस विधेयक की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट मानसून सत्र से पहले प्रस्तुत करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि समिति मूल प्रावधान को बरकरार रखने के साथ कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की भी सिफारिश कर सकती है, ताकि राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित मामलों में इस कानून का गलत इस्तेमाल रोका जा सके। समिति में शामिल कुछ विपक्षी सदस्य असहमति नोट भी दर्ज करा सकते हैं।
विधेयक के पारित होने की राह आसान नहीं मानी जा रही है क्योंकि संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है। मौजूदा संसदीय गणित में सत्तापक्ष को अभी भी अपेक्षित समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों का रुख और संभावित राजनीतिक समीकरण इस विधेयक के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल कानूनी बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, संघीय ढांचे, न्यायिक प्रक्रिया और जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक जिम्मेदारियों से जुड़े व्यापक प्रश्न भी खड़े करता है। संसद के मानसून सत्र में इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होने की संभावना है और यह तय करेगा कि जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
