क्या हम विकास और विनाश के बीच संतुलन साध पाएंगे?
वेनेजुएला में हाल में आए भीषण भूकम्प ने केवल एक देश को नहीं, बल्कि पूरी मानवता को झकझोर दिया है। मृतकों और लापता लोगों की संख्या समय के साथ बदलती रही हो, लेकिन त्रासदी की भयावहता निर्विवाद है। हजारों परिवार अपने प्रियजनों को खोने की असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। ऐसे प्रत्येक अवसर पर पूरी दुनिया संवेदना व्यक्त करती है, राहत सामग्री भेजती है, सहायता अभियान चलाती है, लेकिन एक प्रश्न बार-बार हमारे सामने खड़ा हो जाता है-क्या हम हर बड़ी आपदा से कोई स्थायी सबक सीखते हैं या फिर कुछ दिनों की चर्चा और शोक के बाद सब कुछ भुलाकर पुनः उसी लापरवाह विकास-यात्रा एवं प्रकृति की घोर उपेक्षा पर निकल पड़ते हैं? प्राकृतिक आपदाएं कभी कैलेंडर देखकर नहीं आतीं। वे न देश चुनती हैं, न मौसम और न समय। जब धरती कांपती है, नदियां उफान पर आती हैं, पहाड़ दरकते हैं या समुद्र विकराल रूप धारण कर लेता है, तब विकास के बड़े-बड़े दावे, ऊंची-ऊंची इमारतें और तकनीकी उपलब्धियों का अहंकार कुछ ही क्षणों में धराशायी हो जाता है। ऐसे समय में किसी देश की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि उसकी पूर्व तैयारी, संवेदनशील शासन व्यवस्था और जागरूक नागरिक होते हैं।
वेनेजुएला की त्रासदी ने एक सकारात्मक पक्ष भी सामने रखा। आधुनिक तकनीक ने कुछ क्षेत्रों में लोगों को भूकम्प के झटके महसूस होने से कुछ सेकंड पहले चेतावनी दी। सुनने में यह समय बहुत कम प्रतीत होता है, लेकिन आपदा की घड़ी में यही कुछ सेकंड जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय कर सकते हैं। विज्ञान इस दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे प्रारंभिक चेतावनी तंत्र अधिक सटीक, अधिक तेज और अधिक व्यापक बनाए जाएं, ताकि अधिक से अधिक लोगों का जीवन सुरक्षित रह सके। भारत के लिए यह विषय केवल एक अंतरराष्ट्रीय समाचार नहीं है। हमारा देश स्वयं भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, चक्रवात और सुनामी जैसी अनेक प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलता रहा है। 1993 का लातूर भूकम्प, 2001 का भुज भूकम्प, 2004 की सुनामी, 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2023 की जोशीमठ भू-धंसाव की घटनाएं तथा हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ती बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं आज भी हमारी स्मृतियों में जीवित हैं। इन सभी घटनाओं का एक ही संदेश है-प्रकृति को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
वैज्ञानिक आज भी यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि किस दिन, किस समय और किस स्थान पर भूकम्प आएगा, लेकिन वे वर्षों से यह चेतावनी अवश्य देते रहे हैं कि भारत का लगभग साठ प्रतिशत भूभाग किसी न किसी स्तर के भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। हिमालयी क्षेत्र, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर-पूर्व, गुजरात और अनेक अन्य क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील माने जाते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि यदि भूकम्प की सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं है, तो भी पूर्व तैयारी पूरी तरह संभव है। दुर्भाग्य यह है कि हम तैयारी की अपेक्षा आपदा के बाद राहत और पुनर्वास पर अधिक ध्यान देते हैं। आज देश के लगभग हर शहर में कंक्रीट के विशाल जंगल तेजी से खड़े हो रहे हैं। बहुमंजिला आवासीय परिसर, व्यावसायिक भवन, गगनचुंबी टावर और स्मार्ट सिटी विकास की नई पहचान बन चुके हैं। मुंबई, गुरुग्राम, नोएडा, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और अब जयपुर जैसे शहर भी ऊंची-ऊंची इमारतों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन भवनों की मजबूती केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए है या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए भी?
किसी भी भवन की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब धरती कांपती है, जब अचानक बाढ़ आती है, जब तेज हवाएं चलती हैं या जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। यदि उस समय भवन लोगों की जान बचा सके, तभी उसे वास्तविक विकास का प्रतीक माना जाना चाहिए। केवल ऊंचाई, चमक-दमक और आधुनिक सुविधाएं किसी भवन को सुरक्षित नहीं बनातीं। भारत में भूकम्परोधी निर्माण के लिए मानक और नियम मौजूद हैं। भारतीय मानक ब्यूरो ने स्पष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं। समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि उनके अनुपालन की है। क्या प्रत्येक बहुमंजिला इमारत वास्तव में उन्हीं मानकों के अनुरूप निर्मित हो रही है? क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होती है? क्या निर्माण के बाद संरचनात्मक सुरक्षा का स्वतंत्र परीक्षण किया जाता है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, तो चिंता स्वाभाविक है।
एक अन्य गंभीर चिंता जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ की है। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करना, जंगलों का अंधाधुंध विनाश, अतिक्रमण, खनन और अनियोजित शहरीकरण ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप भूस्खलन, अचानक बाढ़, शहरी जलभराव और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बार-बार आने वाली त्रासदियां हमें चेतावनी दे रही हैं कि विकास का मॉडल प्रकृति-विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति-संगत होना चाहिए। यह मान लेना भी खतरनाक है कि जिस क्षेत्र में पहले कभी बड़ा भूकम्प नहीं आया, वहां भविष्य में भी खतरा नहीं होगा। धरती के भीतर क्या हलचल चल रही है, इसका पूरा रहस्य आज भी मानव नहीं जान पाया है। इसलिए केवल पुराने अनुभवों के आधार पर किसी क्षेत्र को पूर्णतः सुरक्षित मान लेना आत्मघाती हो सकता है। आज भवन निर्माण केवल भूकम्प को ध्यान में रखकर नहीं किया जा सकता। अत्यधिक वर्षा, शहरी बाढ़, तेज हवाएं, तापमान में वृद्धि और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों को भी नगर नियोजन का हिस्सा बनाना होगा। भविष्य के शहरों को बहुस्तरीय सुरक्षा की अवधारणा के आधार पर विकसित करना समय की मांग है। आपदा आने के बाद राहत और पुनर्वास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की अपेक्षा पहले से सुरक्षा पर निवेश करना कहीं अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण है। सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को भी आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक होना होगा। विद्यालयों, कार्यालयों और आवासीय परिसरों में नियमित मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए। आधुनिक चेतावनी प्रणालियों को गांवों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनसे होने वाली तबाही को काफी हद तक कम अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, मजबूत निर्माण मानक, कठोर निगरानी, पारदर्शी प्रशासन और जागरूक नागरिकों का समन्वित प्रयास आवश्यक है। प्रकृति कभी यह नहीं पूछती कि इमारत कितनी महंगी है, किस बिल्डर ने बनाई है या वह किस शहर में खड़ी है। वह केवल उसकी मजबूती और मानव की दूरदर्शिता की परीक्षा लेती है। वेनेजुएला का भूकम्प एक चेतावनी है-विकास की परिभाषा बदलने की। विकसित राष्ट्र वह नहीं होगा जिसके पास सबसे ऊंची इमारतें हों, बल्कि वह होगा जिसके पास सबसे सुरक्षित इमारतें, सबसे जिम्मेदार नगर नियोजन, सबसे संवेदनशील शासन और सबसे सजग नागरिक हों। क्योंकि आपदा आने के बाद राहत देना व्यवस्था की मजबूरी होती है, लेकिन आपदा आने से पहले तैयारी करना एक दूरदर्शी राष्ट्र की संस्कृति और जिम्मेदार शासन की पहचान है।
