June 18, 2026

ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल

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नई दिल्ली ।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक नई शांति संधि की कोशिशों के बीच मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा वैचारिक टकराव उभरकर सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत की सुगबुगाहटों के बीच इजरायल ने अपने रुख को बेहद आक्रामक बनाए रखा है। वाशिंगटन के लिए जहां यह युद्ध वैश्विक कूटनीति और हितों का एक हिस्सा मात्र हो सकता है, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वहां की एक बड़ी आबादी के लिए यह देश के वजूद और अस्तित्व को बचाए रखने की एक अनिवार्य लड़ाई बन चुकी है।

यरुशलम की रणनीतिक सोच और वाशिंगटन के नजरिए में बुनियादी फर्क यह है कि अमेरिका इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत को हालिया तारीखों से जोड़कर देखता है, जबकि इजराइली अवाम के लिए यह लड़ाई अक्टूबर दो हजार तेईस के उस काले दिन से शुरू हो चुकी है जब उनकी सीमाओं के भीतर घुसकर बर्बरता को अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन जब भी शांति और समझौते की बात आगे बढ़ाता है, इजरायली रक्षा बल अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी मुल्कों में बने आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और तेज कर देते हैं।

बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक जीवन और उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी है कि दुश्मनों के सामने रियायतें देना आत्मघाती साबित होता है। संयुक्त राष्ट्र में देश के सबसे युवा राजदूत के रूप में काम कर चुके नेतन्याहू के पास सुरक्षा मामलों का लंबा व्यावहारिक अनुभव है, जिसके दम पर वे कई बार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दबाव को भी खारिज कर चुके हैं। इजरायल में यह माना जाता है कि जब भी किसी कमजोर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कदम पीछे खींचे हैं, देश को और बड़े संकटों का सामना करना पड़ा है।

इजरायल की अंदरूनी राजनीति भले ही बेहद जटिल और मिली-जुली सरकारों के दौर से गुजरती रही हो, लेकिन बाहरी खतरों के समय वहां का समाज पूरी तरह एकजुट हो जाता है। वर्तमान में देश की साठ फीसदी से अधिक जनता राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर सरकार की इस सैन्य नीति के साथ मजबूती से खड़ी है कि ईरान समर्थित उग्रवादी संगठनों का पूरी तरह सफाया किया जाए। गाजा पट्टी से वर्ष दो हजार पांच में सेना हटाने के बाद जिस तरह वहां हमास का गढ़ तैयार हुआ, उसने इजरायली सुरक्षा तंत्र को यह सबक सिखाया है कि जमीन के बदले शांति की नीति हमेशा बेअसर रहती है।

सैन्य मोर्चे पर इजरायल इस समय चारों तरफ से खतरनाक हथियारों से लैस गैर-राज्य अभिकर्ताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ गाजा में सक्रिय नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ लेबनान की सीमा पर आधुनिक मिसाइलों से लैस हिजबुल्लाह मौजूद है, जिसने उत्तरी इजरायल के नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर रखा है। इजरायली सेना की रणनीति अब बिल्कुल साफ है कि वे किसी भी मोर्चे पर कमजोरी नहीं दिखाएंगे और उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए लितानी नदी तक के पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए पूरी तरह खामोश कर देंगे ताकि भविष्य में रॉकेट हमलों का खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो सके।

कूटनीतिक स्तर पर यरुशलम इस बात को भली-भांति समझता है कि महाशक्तियों की नीतियां उनके तात्कालिक राजनीतिक फायदों के हिसाब से बदलती रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए युद्ध को बीच में रोकना एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इजरायल के लिए युद्ध को अधूरा छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। यदि यह जंग बिना किसी ठोस नतीजे के रुकती है, तो तेहरान से हथियारों की आपूर्ति दोबारा शुरू हो जाएगी और सीमावर्ती इलाकों से विस्थापित हुए लाखों इजरायली नागरिक कभी भी अपने घरों को सुरक्षित वापस नहीं लौट पाएंगे।

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