भारत में बढ़ती तंबाकू और शराब की लत: NFHS-6 रिपोर्ट ने खोली स्वास्थ्य संकट की पोल
यह आंकड़े राष्ट्रीय औसत को दर्शाते हैं, लेकिन अगर राज्यों के स्तर पर देखें तो स्थिति और भी ज्यादा डरावनी नजर आती है। पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में तंबाकू का सेवन करने वालों की संख्या खतरनाक स्तर पर है, वहीं पंजाब, गोवा और सिक्किम जैसे राज्यों में शराब के शौकीनों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार के सर्वे में शहरी इलाकों में नशे की लत ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले काफी अधिक दर्ज की गई है। कामकाजी और सबसे उत्पादक माने जाने वाले 25 से 54 वर्ष के आयु वर्ग के लोग इस लत से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जो देश के आर्थिक भविष्य के लिए भी एक बड़ा झटका है।
तनाव और खराब जीवनशैली बनी वजह; इलाज के आर्थिक बोझ तले दब रहे परिवार
चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि आधुनिक दौर में बढ़ता मानसिक तनाव, काम का दबाव, बदलती और बेहद खराब जीवनशैली के साथ-साथ जागरूकता का अभाव इस समस्या की सबसे प्रमुख वजहें हैं। लोग अक्सर शुरुआत में तनाव कम करने या दोस्तों के दबाव में आकर शौक के तौर पर नशा शुरू करते हैं, जो धीरे-धीरे एक गंभीर लत में तब्दील हो जाता है। तंबाकू और शराब का यह अनियंत्रित और लगातार सेवन सीधे तौर पर मानव शरीर को खोखला कर रहा है। इसके कारण मुंह और फेफड़ों का कैंसर, लिवर सिरोसिस, दिल का दौरा पड़ना और फेफड़ों की गंभीर बीमारी सीओपीडब्ल्यू (COPD) जैसी जानलेवा बीमारियों के मामले अस्पतालों में बाढ़ की तरह आ रहे हैं। रिपोर्ट आगाह करती है कि देश में हर साल लाखों लोगों की असमय मौत का कारण यही नशा बन रहा है, जिससे न सिर्फ कीमती जानें जा रही हैं, बल्कि इलाज के भारी-भरकम खर्च के कारण लाखों परिवार कर्ज और गरीबी के दलदल में धंसते जा रहे हैं।
समय रहते संभलना जरूरी; सख्त नियमों और जागरूकता से ही निकलेगा समाधान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस उभरते संकट से निपटने के लिए कुछ अत्यंत जरूरी और कड़े कदम उठाने की वकालत की है। उनके अनुसार, अब समय आ गया है जब सरकार को स्कूल और कॉलेजों के स्तर पर व्यापक रूप से नशामुक्ति और जागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि देश की भावी पीढ़ी को इस जहर से बचाया जा सके। इसके साथ ही तंबाकू और शराब की बिक्री, विज्ञापनों और उपलब्धता पर बेहद सख्त कानूनी नियम लागू करने की दरकार है। मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए काउंसलिंग केंद्रों की संख्या बढ़ानी होगी ताकि लोग तनाव से निपटने के लिए नशे का सहारा न लें। कुल मिलाकर, NFHS-6 की यह रिपोर्ट देश के नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह है। यदि अब भी सामूहिक प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या देश के चिकित्सा तंत्र को ध्वस्त कर देगी। इस संकट से पार पाने के लिए सरकार, नागरिक समाज और खुद आम जनता को मिलकर एक बड़ी जंग छेड़नी होगी।
