June 7, 2026

24 हफ्ते का गर्भ होने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग को मां बनने की अनुमति

0
untitled-1780831627

मध्य प्रदेश । मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को बच्चे को जन्म देने की अनुमति प्रदान करते हुए राज्य सरकार को नवजात के पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारियां उठाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता और उसके परिवार की इच्छा का सम्मान करना आवश्यक है, क्योंकि उन्होंने गर्भपात कराने से स्पष्ट रूप से इनकार किया था।

मामला खरगोन जिले के बालकवाड़ा थाना क्षेत्र का है, जहां एक नाबालिग किशोरी के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था। घटना के बाद किशोरी गर्भवती हो गई। जब मामला न्यायालय के समक्ष पहुंचा, तब गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक हो चुकी थी। चूंकि पीड़िता नाबालिग थी और गर्भावस्था उन्नत अवस्था में थी, इसलिए मंडलेश्वर स्थित पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने उचित दिशा-निर्देश और आदेश के लिए मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया।

हाईकोर्ट ने मामले को याचिका के रूप में दर्ज कर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान बालकवाड़ा थाना के सब-इंस्पेक्टर मिथुन चौबे की उपस्थिति में पीड़िता और उसके माता-पिता अदालत में पेश हुए। पहचान की पुष्टि के बाद न्यायालय ने पीड़िता और उसके परिजनों की राय जानी। इस दौरान पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह गर्भपात नहीं कराना चाहती और बच्चे को जन्म देना चाहती है। उसके माता-पिता ने भी इस निर्णय का समर्थन किया।

शनिवार को जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी की वेकेशन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पीड़िता की इच्छा को महत्व दिया। अदालत ने माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता की राय और उसकी स्वतंत्र इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। इसी आधार पर न्यायालय ने बच्चे को जन्म देने की अनुमति प्रदान की।

साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए। आदेश के अनुसार गर्भावस्था के दौरान पीड़िता को सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। प्रसव, उपचार, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्त खर्च सरकार वहन करेगी। इसके अलावा नवजात के जन्म के बाद उसकी देखभाल, शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा और अन्य आवश्यक जरूरतों की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार पर होगी।

हाईकोर्ट ने संबंधित कलेक्टर को निर्देश दिया है कि नवजात के 16 वर्ष की आयु तक उसके समुचित विकास और आवश्यक सुविधाओं को सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियां बच्चे और उसकी मां के भविष्य में बाधा नहीं बननी चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जहां दुष्कर्म पीड़िता गर्भपात के बजाय बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है। न्यायालय ने एक ओर पीड़िता की इच्छा और अधिकारों की रक्षा की है, वहीं दूसरी ओर जन्म लेने वाले बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए राज्य की जिम्मेदारी भी तय की है।

यह निर्णय न्यायिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें पीड़िता, उसके परिवार और नवजात के हितों को संतुलित रूप से ध्यान में रखा गया है।

0Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *